प्रयागराज में बाढ़ का कहर: नावों पर सफर, छतों पर बसेरा और जिंदगी की जद्दोजहद
प्रयागराज, जो इस साल की शुरुआत में भव्य कुंभ मेले की मेज़बानी कर चुका है, इन दिनों एक बार फिर से चर्चा में है, लेकिन इस बार वजह धार्मिक नहीं, बल्कि प्राकृतिक आपदा है। शहर के कई इलाके बाढ़ की चपेट में हैं और हालात इतने खराब हैं कि सड़कों पर गाड़ियों की जगह अब नावें चल रही हैं। हजारों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हैं और राहत शिविरों में शरण लिए हुए हैं।
बाढ़ से प्रभावित इलाके और जनजीवन
प्रयागराज के 51 शहरी इलाकों में पानी भर चुका है और इन क्षेत्रों में लगभग 5 लाख लोगों का जीवन प्रभावित हुआ है। सबसे ज़्यादा असर उन इलाकों में हुआ है जो गंगा और यमुना के किनारे बसे निचले क्षेत्रों में आते हैं। हर साल मानसून में पानी भरने की समस्या सामने आती है, लेकिन इस बार स्थिति कहीं अधिक भयावह है।
शहर के लोग छतों पर रहने को मजबूर हैं। बिजली कट चुकी है, मोबाइल नेटवर्क काम नहीं कर रहे, और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए नावों का सहारा लेना पड़ रहा है। राहत की बात यह है कि गंगा और यमुना का जलस्तर धीरे-धीरे कम हो रहा है, लेकिन हालात सामान्य होने में अभी कुछ दिन और लग सकते हैं।
प्रशासन की नजर और जिम्मेदारी
प्रयागराज के ज़िलाधिकारी मनीष कुमार वर्मा ने जानकारी दी कि बाढ़ का कारण बारिश के साथ-साथ यमुना नदी में बांध से छोड़ा गया अतिरिक्त पानी भी है। उन्होंने कहा कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में 323 नावें और 3 मोटर बोट लगाई गई हैं ताकि फंसे हुए लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सके।
बाढ़ से निपटने के लिए प्रशासन ने 377 राहत शिविरों की स्थापना की है, जिनमें 41,842 से अधिक लोग अस्थायी रूप से रह रहे हैं। हर शिविर में स्वास्थ्य शिविर भी लगाए गए हैं और एडीएम स्तर के अधिकारी शिविरों की निगरानी कर रहे हैं।
लोगों की आपबीती: छतों पर जिंदगी और नावों पर सफर
राजापुर में रहने वाले ओमप्रकाश, जो पेशे से वकील हैं, 2013 से इसी इलाके में रह रहे हैं। उनका घर पूरी तरह पानी में डूब गया है लेकिन वह अब भी छत पर टिके हुए हैं। रोज़ नाव से घर आते हैं और ज़रूरी सामान इकट्ठा करते हैं। उनका मानना है कि आबादी बढ़ने से नदियों पर दबाव बढ़ गया है और यही बाढ़ की बड़ी वजह बन रहा है।
हिना फातिमा, जो करेली की रहने वाली हैं, अपने बच्चों के साथ घर की ऊपरी मंजिल पर रह रही हैं। उनका कहना है कि शुरुआती दिनों में कोई मदद नहीं मिली, बिजली कट गई और मोबाइल भी काम नहीं कर रहे। बाद में राहत सामग्री पहुंचाई गई लेकिन अब भी जिंदगी बेहद कठिन है।
ज्ञान प्रकाश, जिनके पास एक खरगोश है, सुरक्षित स्थान पर रहने चले गए हैं लेकिन अपने पालतू जानवर को खाना खिलाने रोज़ लौटते हैं क्योंकि वहां उसे रखने की जगह नहीं है।

जानलेवा बनी बाढ़: तीन युवकों की मौत
बाढ़ के बीच गंगा नदी में नहाने गए तीन युवकों की डूबने से मौत हो गई। डीसीपी कुलदीप सिंह गुनावत के मुताबिक, मनसौता घाट पर यह हादसा हुआ। दो अन्य युवकों को सुरक्षित बचा लिया गया। यह घटना दर्शाती है कि बाढ़ सिर्फ बेघर करने वाली आपदा ही नहीं, बल्कि जानलेवा भी साबित हो सकती है।
महिलाओं की चिंता और शिविरों का हाल
ऋषिकुल वाल्मीकि इंटर कॉलेज में बने राहत शिविर में रहने वाली सुमन सोनकर ने बताया कि घर का सामान छोड़कर भागना पड़ा और अपनी बेटियों को रिश्तेदारों के पास भेजना पड़ा। शिविरों में बुनियादी सुविधाएं तो हैं, लेकिन मानसिक तनाव और अनिश्चितता हर दिन के साथी हैं।
प्रशासन का कहना है कि 17,924 खाद्यान्न पैकेट और ढाई लाख लंच पैकेट वितरित किए जा चुके हैं। 40 से अधिक लंगर चलाए जा रहे हैं ताकि कोई भी भूखा न रहे।
खेतों की बर्बादी और ग्रामीणों की चिंता
ग्रामीण इलाकों में बाढ़ ने खेती-किसानी पर कहर बरपाया है। खेतों में पानी भर चुका है और फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गई हैं। प्रशासन द्वारा नुक़सान का आंकलन करने के लिए रिपोर्ट मांगी जा रही है ताकि मुआवजे की प्रक्रिया शुरू की जा सके।
उत्तर प्रदेश में 24 जिलों की 59 तहसीलें और 1,245 गांव बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। 33,252 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्रफल जलमग्न हो चुका है। 26,000 से अधिक मवेशियों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है।
प्रयागराज में बाढ़ का इतिहास
प्रयागराज में हर साल बाढ़ आना कोई नई बात नहीं है। स्थानीय लोग बताते हैं कि हर तीन-चार साल में गंभीर स्थिति बनती है। 1978 में गंगा का जलस्तर 88.39 मीटर और यमुना का 87.99 मीटर पहुंच गया था, जो अब तक का रिकॉर्ड है। इस बार भी जलस्तर खतरनाक स्तर के करीब पहुंच गया।
6 अगस्त 2025 को जारी आंकड़ों के अनुसार, गंगा का जलस्तर फाफामऊ में 85.74 मीटर और यमुना का 85.31 मीटर रिकॉर्ड किया गया है, जबकि खतरे का निशान 84.73 मीटर है। 2013 में भी इस तरह की बाढ़ आई थी, लेकिन इस बार हालत उससे भी बदतर बताई जा रही है।

समाधान की राह और जिम्मेदारी
बाढ़ की बार-बार वापसी ये सवाल उठाती है कि आखिर इसका स्थायी समाधान क्या है? स्थानीय लोगों का मानना है कि गंगा और यमुना के किनारे अनियंत्रित अतिक्रमण और बेतरतीब निर्माण बाढ़ को और गंभीर बना रहे हैं। ज़िलाधिकारी ने भी संकेत दिया है कि बाढ़ समाप्त होने के बाद इसके कारणों की गंभीरता से समीक्षा की जाएगी।
निष्कर्ष
प्रयागराज इस समय बाढ़ की भीषण त्रासदी से गुजर रहा है। शहर के लाखों लोग संकट में हैं, जनजीवन अस्त-व्यस्त है और उम्मीदें केवल राहत और पुनर्वास पर टिकी हैं। जरूरत है एक दीर्घकालिक योजना की ताकि आने वाले वर्षों में इस त्रासदी को दोहराने से रोका जा सके।
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