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उत्तरकाशी त्रासदी: धराली में बादल फटने से भारी तबाही, कई होटल बहे, दर्जनों लोग लापता

उत्तरकाशी बादल फटना 2025 में धराली गांव सबसे ज़्यादा प्रभावित रहा। इस प्राकृतिक आपदा ने कई घरों, होटलों और मंदिरों को पूरी तरह तबाह कर दिया है। प्रशासन और रेस्क्यू टीम राहत कार्य में जुटी हुई हैं। आइए जानते हैं इस भयावह घटना की पूरी जानकारी।

उत्तराखंड का उत्तरकाशी ज़िला एक बार फिर प्राकृतिक आपदा का शिकार बन गया है। मंगलवार, 5 अगस्त 2025 को हर्षिल क्षेत्र के धराली गांव में बादल फटने की घटना ने पूरे इलाके में तबाही मचा दी। इस आपदा के कारण न केवल जन-धन की भारी क्षति हुई है, बल्कि कई लोगों की ज़िंदगियां भी पूरी तरह से बदल गई हैं।

कैसे हुई यह तबाही?

हर्षिल क्षेत्र में स्थित खीर गंगा गदेरे (एक स्थानीय नाला) का जलस्तर अचानक बहुत तेजी से बढ़ गया, जिससे आसपास के क्षेत्र में विनाश फैल गया। देखते ही देखते धराली गांव में बहते पानी और मलबे ने कई घरों, होटलों और दुकानों को अपने साथ बहा लिया। इस घटना ने 2013 की केदारनाथ त्रासदी की भयावह यादें ताजा कर दी हैं।

अब तक कितना नुकसान?

उत्तरकाशी के जिलाधिकारी प्रशांत आर्य ने मीडिया को जानकारी दी कि इस आपदा में अब तक चार लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। इसके साथ ही कई संपत्तियां नष्ट हो गई हैं। हालांकि स्थानीय लोगों का दावा है कि यह नुकसान प्रशासन द्वारा बताए गए आंकड़ों से कहीं अधिक बड़ा है।

प्रत्यक्षदर्शी की आंखों देखी

धराली गांव की निवासी आस्था पवार ने इस घटना की जो जानकारी साझा की, वह दिल दहला देने वाली है। उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए कहा,

“मैंने अपनी आंखों से बड़े-बड़े होटल बहते देखे। एक के बाद एक मलबे की लहरें आती रहीं। जो पहली लहर आई थी, वो सबसे भयानक थी। उसके बाद भी हर 10–15 मिनट में मलबा आता रहा।”

आस्था के मुताबिक़, सरकार या प्रशासन की ओर से कोई पूर्व चेतावनी नहीं दी गई थी। न ही स्कूल बंद किए गए थे, और न ही किसी को इस आपदा के बारे में जानकारी थी।

“अगर कोई चेतावनी मिलती तो लोग पूजा में भी नहीं जाते। चार अगस्त की रात को पूरे गांव में पूजा थी। शुक्र है कि हादसा रात में नहीं हुआ, वरना जनहानि और अधिक हो सकती थी,” – आस्था पवार

धराली गांव में तबाही का मंजर

धराली गांव हर्षिल वैली के पास स्थित है, जो गंगोत्री धाम जाने वाले मार्ग पर पड़ता है। यहां का स्थानीय बाजार, होटल और कल्प केदार मंदिर पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं।
आस्था बताती हैं,

“तीन-चार मंजिला होटल थे, अब उनकी छत तक नहीं दिख रही। मार्केट गायब हो गया है। कल्प केदार मंदिर तक अब नजर नहीं आ रहा।”

रेस्क्यू ऑपरेशन और सरकारी प्रतिक्रिया

घटना की जानकारी मिलते ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर दुख जताया और कहा कि वे स्थिति की गहन निगरानी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राहत और बचाव कार्य में तेजी लाई जा रही है और ज़िला प्रशासन मौके पर है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस आपदा पर संवेदना प्रकट की और कहा कि,

“मैं उत्तरकाशी में आई इस त्रासदी से प्रभावित लोगों के प्रति संवेदना प्रकट करता हूं और उनके सुरक्षित होने की कामना करता हूं।”

गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि राहत कार्यों के लिए ITBP की तीन और NDRF की चार टीमों को मौके पर भेजा गया है।

कितने लोग लापता?

NDRF के डीआईजी मोहसेन शाहेदी ने जानकारी दी कि अब तक की जानकारी के अनुसार 40 से 50 घर बह चुके हैं और 50 से अधिक लोग लापता हैं। प्रभावित क्षेत्रों को खाली कराया जा रहा है और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा जा रहा है।

क्या होता है बादल फटना?

मौसम विभाग के अनुसार, जब एक छोटे से क्षेत्र (1 से 10 किलोमीटर) में एक घंटे के भीतर 10 सेंटीमीटर या उससे अधिक बारिश होती है, तो उसे ‘बादल फटना’ कहा जाता है। यह घटना अत्यधिक तीव्र होती है और अचानक आती है, जिससे चेतावनी देने का समय नहीं मिल पाता।

क्या इस पर पूर्वानुमान संभव है?

बादल फटने जैसी घटनाएं छोटे स्तर पर होने वाली जलवायु गतिविधियों की वजह से होती हैं। हालांकि रडार और मौसम तकनीक बड़ी बारिश का अनुमान लगा सकते हैं, लेकिन किस खास क्षेत्र में बादल फटेंगे, इसका पूर्वानुमान लगाना फिलहाल बेहद मुश्किल है।

किस मौसम में होता है बादल फटना?

भारत के उत्तरी भागों में यह घटना सामान्यतः मई से अगस्त के बीच यानी प्री-मानसून और मानसून के समय अधिक होती है। उत्तराखंड और हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों में इसकी आशंका अधिक होती है, जहां पहले से ही नदियां और झीलें मौजूद होती हैं।

क्या होनी चाहिए तैयारी?

इस प्रकार की आपदाओं से बचने के लिए ज़रूरी है कि पहाड़ी राज्यों में समय रहते चेतावनी प्रणाली को मजबूत किया जाए, खासकर उन इलाकों में जो तीर्थयात्राओं या पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा:

  • हाई रिस्क ज़ोन की पहचान कर वहां निर्माण को सीमित किया जाए।
  • स्कूल, होटल और बाजार क्षेत्रों में अलर्ट सिस्टम लागू हो।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएं।

निष्कर्ष

उत्तरकाशी की यह त्रासदी एक बार फिर यह बताने के लिए काफी है कि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक असंतुलन अब सामान्य जीवन के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। धराली जैसी शांत और धार्मिक भावना से जुड़ी जगहों पर इस प्रकार की घटनाएं न केवल स्थानीय लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित करती हैं, बल्कि पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि कब तक हम इस तरह की आपदाओं को “प्राकृतिक” कहकर टालते रहेंगे।

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