धर्म

वृंदावन के श्री बांके बिहारी कॉरिडोर को लेकर विवाद: क्यों विरोध में हैं स्थानीय लोग और क्या चाहती है सरकार

वृंदावन का कॉरिडोर विवाद: विरासत और विकास के बीच टकराव

वृंदावन कॉरिडोर प्रस्ताव के चलते उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय गोस्वामी समुदाय के बीच तनाव बढ़ गया है। यह विवाद धार्मिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक पहलुओं से जुड़ा है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर के इर्द-गिर्द एक भव्य कॉरिडोर बनाने की योजना बनाई है। यह शहर मथुरा से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दूर स्थित है और भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं की पवित्र धरती के रूप में जाना जाता है। वहीं, इस मंदिर से जुड़ा सेवायत गोस्वामी समुदाय इस योजना का विरोध कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सरकार की इस योजना को अस्थायी रूप से रोक दिया है और विवाद का समाधान आने तक किसी भी निर्माण कार्य पर रोक लगाई है। लेकिन इस विवाद ने वृंदावन और मथुरा के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को एक बार फिर देश की सुर्खियों में ला दिया है।


वृंदावन का ऐतिहासिक महत्व

वृंदावन की संकरी गलियां, प्राचीन मंदिर और यमुना तट पर बने घाट, इसे केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बनाते हैं। यहां की गलियों को कुंज गलियां कहा जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने इन गलियों में अपनी रास लीलाओं का आनंद लिया था।

हर दिन हज़ारों श्रद्धालु इन गलियों से होकर श्री बांके बिहारी मंदिर तक पहुँचते हैं। इन संकरी गलियों के साथ-साथ छोटे-छोटे मंदिर और पुराने घर भी शहर की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं। स्थानीय लोग मानते हैं कि यदि कॉरिडोर का निर्माण होता है तो वृंदावन का प्राचीन और ऐतिहासिक स्वरूप बदल जाएगा।

संकरी गलियों के बीच बना प्राचीन मंदिर

वृंदावन में यमुना तट पर बने घाटों और परिक्रमा मार्ग से निकलती कई गलियां प्राचीन श्री बांके बिहारी मंदिर तक पहुंचती हैं. मान्यताओं के मुताबिक़ ये कुंज गलियां हैं जहां भगवान श्रीकृष्ण लीलाएं करते थे.


स्थानीय लोगों की चिंता

मंदिर के पास रहने वाले लोगों का कहना है कि कॉरिडोर से उनकी ज़िंदगी प्रभावित होगी। उनके घर और दुकानें टूट सकती हैं। उदाहरण के लिए, निम्मी गोस्वामी (70 वर्ष) कहती हैं, “कृष्ण ने यहीं रास लीलाएं की हैं। इस ब्रज को हम कभी नहीं भूल सकते।” उनके पति रुकमणि गोस्वामी का कहना है, “ये कोई साधारण स्थान नहीं हैं। ये कुंज गलियां हैं, जो अब समाप्त हो रही हैं।”

दीपशिखा गोस्वामी, जो मंदिर से कुछ सौ मीटर दूर प्राचीन घर में रहती हैं, कहती हैं, “हम चाहते हैं कि सरकार हमारी विरासत की सुरक्षा करे, लेकिन हमें हटाया जा रहा है। हमारी पीढ़ियों की मेहनत और प्रेम यहां की मिट्टी से जुड़ा है। इसे छोड़ना हमारे लिए आसान नहीं है।”

स्थानीय दुकानदार भी मुआवज़े की प्रक्रिया और सरकारी योजनाओं को लेकर असंतुष्ट हैं। मुन्ना लाल मिश्रा का कहना है, “हमें नहीं बताया गया कि हमें किस जगह दुकान दी जाएगी और कितना मुआवज़ा मिलेगा। सिर्फ़ कॉरिडोर की चर्चा हो रही है, हमारे जीवन और जीविका का कोई ख्याल नहीं रखा गया।”

विरासत और संस्कृति को बचाने का सवाल


सरकार का दृष्टिकोण: सुविधा और सुरक्षा

उत्तर प्रदेश सरकार का तर्क है कि कॉरिडोर बनने से श्रद्धालुओं के लिए बेहतर व्यवस्था और सुविधाएं उपलब्ध होंगी। ब्रज तीर्थ विकास परिषद (UPBTDC) के सीईओ श्याम बहादुर सिंह का कहना है,

“श्री बांके बिहारी मंदिर तक जाने वाले रास्ते बहुत संकरे हैं। रोज़ाना तीस से पचास हज़ार लोग दर्शन के लिए आते हैं, सप्ताहांत पर संख्या डेढ़ लाख और त्योहारों पर तीन लाख तक पहुंच जाती है। वर्तमान संकरी गलियां इतनी भारी भीड़ को संभालने में सक्षम नहीं हैं। प्रस्तावित कॉरिडोर से भगदड़ जैसी परिस्थितियों से बचा जा सकेगा।”

कॉरिडोर बनने पर लगभग पंद्रह हज़ार लोगों के लिए जगह उपलब्ध होगी। इसमें दुकानें और अन्य सुविधाएं भी शामिल होंगी।


मंदिर प्रबंधन और गोस्वामी समुदाय का पक्ष

श्री बांके बिहारी मंदिर की स्थापना 1864 में हुई थी। इसके पहले, इस प्रतिमा को वृंदावन के निधि वन में रखा गया था। इस मंदिर में सेवा करने वाले सेवायत गोस्वामी परिवारों का दावा है कि यह मंदिर उनके पूर्वजों द्वारा बनाया गया था और वे इसके आधिकारिक स्वामी हैं।

रजत गोस्वामी, जो गोस्वामी समुदाय की पैरवी कर रहे हैं, कहते हैं,

“कॉरिडोर के नाम पर सरकार इस निजी मंदिर का अधिग्रहण करना चाहती है। हमारी पीढ़ियां पांच सौ सालों से ठाकुर महाराज की सेवा करती रही हैं। यह केवल हमारा नहीं, बल्कि हमारी विरासत है।”

गोस्वामी समुदाय में लगभग चार सौ लोग सक्रिय रूप से मंदिर की सेवा में लगे हुए हैं।

दूसरी ओर, UPBTDC का कहना है कि मंदिर किसी की निजी संपत्ति नहीं है। श्याम बहादुर सिंह का कहना है,

वृंदावन का ऐतिहासिक और प्राचीन श्री बांके बिहारी मंदिर, भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं से जुड़ा पवित्र स्थल।

सरकार ने मंदिर के प्रबंधन के लिए मई 2025 में एक अध्यादेश भी पास किया था, जिसे इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस अध्यादेश को रोक दिया है और मंदिर प्रबंधन के लिए एक चौदह सदस्यीय अंतरिम समिति बनाई है।


भूमि अधिग्रहण और मुआवज़ा

प्रस्तावित कॉरिडोर के लिए मंदिर से यमुना तट तक लगभग पाँच एकड़ भूमि अधिग्रहित करनी है। प्रशासन का कहना है कि प्रभावित लोगों को उचित मुआवज़ा दिया जाएगा।

श्याम बहादुर सिंह के अनुसार, लगभग 187 संरचनाएं शामिल हैं, जिनमें दुकानदार, मकान मालिक और किरायेदार शामिल हैं। उन्हें मंदिर फंड से समुचित मुआवज़ा दिया जाएगा। लेकिन स्थानीय लोग इस मुआवज़े को पर्याप्त नहीं मानते।

उषा गोस्वामी (80+) कहती हैं, “हमारे पूर्वज यहीं से विदा हुए थे। हमारी भी यही इच्छा है कि यहीं से जाएं। अगर कॉरिडोर बनाना ही है, तो सरकारी जमीन पर बनाएं। हमें क्यों हटाया जा रहा है?”


मंदिर फंड और वित्तीय विवाद

श्री बांके बिहारी मंदिर के बैंक खातों में 300 करोड़ रुपये से अधिक हैं। सरकार इस फंड का उपयोग कॉरिडोर निर्माण और भूमि अधिग्रहण के लिए करना चाहती थी। सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 में सरकार को मंदिर फंड के 500 करोड़ रुपये का उपयोग करने की अनुमति दी थी, लेकिन बाद में इस आदेश को स्थगित कर दिया गया।

सेवायत गोस्वामी समुदाय का आरोप है कि सरकार का मुख्य उद्देश्य मंदिर के फंड और दक्षिणा पर नज़र है।


जनहित याचिका और सुरक्षा कारण

2022 में कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर में भगदड़ हुई थी, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई और कई घायल हुए। इसके बाद सरकार ने मंदिर के आसपास भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा के लिए कॉरिडोर बनाने की योजना बनाई।

हालांकि, जनहित याचिकाएं और कई क़ानूनी मामले अभी लंबित हैं। भूमि अधिग्रहण से प्रभावित लोग अदालत में अपने अधिकारों की रक्षा कर रहे हैं।


श्रद्धालुओं की राय

श्रद्धालुओं में भी मतभेद हैं।

  • हरियाणा से आए एक श्रद्धालु कहते हैं, “भीड़ को नियंत्रित करने की व्यवस्था होनी चाहिए। दर्शन सुगम होना चाहिए।”
  • पंजाब से आई महिला कहती हैं, “भगवान के दर्शन का आनंद बढ़ाने के लिए सुविधाएं होनी चाहिए।”
  • वहीं, वृंदावन की गलियों में जाकर भगवान के दर्शन का वास्तविक अनुभव लेने वाले भक्त कहते हैं, “कॉरिडोर बनने से असली रस और आनंद खत्म हो जाएगा। ये कुंज गलियां ही ठाकुर जी की लीलाओं का अनुभव देती हैं।”

विरासत और विकास के बीच संतुलन

वृंदावन की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत बनाम विकास और भीड़ प्रबंधन का संतुलन अब सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

  • मंदिर की व्यवस्थाओं और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए कॉरिडोर आवश्यक है।
  • दूसरी ओर, पुराने घर, गलियां, मंदिर और स्थानीय संस्कृति का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

मथुरा निवासी बिहारीलाल शर्मा कहते हैं,

“सरकार हिंदू स्थलों का गौरव बढ़ा रही है, विकास कर रही है, लेकिन विरासत भी संरक्षित होनी चाहिए। गोस्वामियों और सरकार के बीच सामंजस्य से ही व्यवस्था बेहतर हो सकती है।”

हालांकि, फिलहाल न तो सरकार और न ही सेवायत गोस्वामी समुदाय के बीच कोई स्पष्ट संवाद या समझौता दिखाई दे रहा है। भविष्य का निर्णय अदालतों के आदेश पर निर्भर करेगा।


निष्कर्ष

वृंदावन में श्री बांके बिहारी मंदिर के आसपास कॉरिडोर निर्माण का विवाद विकास और विरासत के टकराव की कहानी है।

  • यह विवाद केवल भूमि अधिग्रहण और भवन निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक भावना और पीढ़ियों की सेवा भी जुड़ी है।
  • स्थानीय लोग अपनी जड़ों और भूमि से जुड़े हुए हैं, जबकि सरकार और प्रशासन श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखकर कॉरिडोर बनाना चाहते हैं।
  • अदालतों का निर्णय, जनहित याचिकाओं और मंदिर प्रबंधन के मामलों की सुनवाई, इस विवाद के भविष्य का निर्धारण करेगी।

वृंदावन की गलियों में भगवान कृष्ण की लीलाओं की गूँज, कुंज गलियों का ऐतिहासिक स्वरूप और स्थानीय लोगों की भावनाएं — सब कुछ इस विवाद का केंद्र हैं। यह मामला साबित करता है कि विकास और संस्कृति के बीच संतुलन बनाना कितना जटिल और संवेदनशील कार्य है।

Image source – BBC NEWS

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