राजनीति

राहुल गांधी का अरुण जेटली पर बयान और विवाद: एक तथ्यात्मक विश्लेषण

राहुल गांधी अरुण जेटली विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। राहुल गांधी के एक हालिया बयान में उन्होंने दावा किया कि कृषि कानूनों का विरोध करते समय उन्हें धमकाने के लिए अरुण जेटली को भेजा गया था..

कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी एक बार फिर अपने बयान को लेकर विवादों में घिर गए हैं। इस बार मामला पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री स्व. अरुण जेटली से जुड़ा है। राहुल गांधी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दावा किया कि कृषि कानूनों का विरोध करने के दौरान उन्हें धमकाने के लिए अरुण जेटली को उनके पास भेजा गया था। राहुल गांधी के इस बयान ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है, क्योंकि यह दावा तथ्यों से मेल नहीं खाता।

राहुल गांधी का दावा क्या है?

1 अगस्त 2025 को आयोजित लीगल कॉन्क्लेव 2025 में राहुल गांधी ने कहा:

“मुझे याद है जब मैं कृषि कानूनों का विरोध कर रहा था… वो आज दुनिया में नहीं हैं, मुझे ये नहीं कहना चाहिए, लेकिन कहूंगा। मुझे धमकाने के लिए अरुण जेटली जी को मेरे पास भेजा गया था।”

उन्होंने आगे कहा:

“अरुण जेटली ने मुझसे कहा कि अगर आप सरकार के खिलाफ लड़ेंगे तो हमें आपके खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ेगी। मैंने उन्हें देखा और कहा, आपको पता नहीं कि आप किससे बात कर रहे हैं।”

क्या राहुल गांधी का बयान तथ्यात्मक रूप से सही है?

नहीं।

  • अरुण जेटली का निधन 24 अगस्त 2019 को हुआ था।
  • तीनों कृषि कानून 5 जून 2020 को अध्यादेश के रूप में लाए गए और 17-20 सितंबर 2020 को संसद में पास हुए।

इस तरह, जब कृषि कानून अस्तित्व में आए, तब अरुण जेटली जीवित ही नहीं थे। ऐसे में राहुल गांधी का यह दावा तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह ग़लत साबित होता है।

अरुण जेटली के बेटे रोहन जेटली का जवाब

राहुल गांधी के बयान पर अरुण जेटली के बेटे और दिल्ली से राज्यसभा सांसद रोहन जेटली ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा:

“मैं राहुल गांधी को याद दिलाना चाहता हूं कि कृषि कानून 2020 में लाए गए, जबकि मेरे पिता का निधन 2019 में हुआ। और मेरे पिता के स्वभाव में धमकाना था ही नहीं।”

उन्होंने यह भी कहा कि:

बीजेपी नेताओं का तीखा हमला

राहुल गांधी के इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने एक सुर में तीखा विरोध दर्ज कराया है:

1. अनुराग ठाकुर (केंद्रीय मंत्री):

“हर दिन एक नया झूठ, हर दिन एक नया प्रोपेगैंडा। जब बिल 2020 में आया, तो अरुण जेटली जी 2019 में कैसे धमकाने आ सकते थे?”

उन्होंने राहुल गांधी से अरुण जेटली के परिवार, बीजेपी और देश से माफी मांगने की मांग की।

2. निर्मला सीतारमण (वित्त मंत्री):

“अगर गैर-जिम्मेदारी का कोई चेहरा है तो वो राहुल गांधी हैं। मृत व्यक्ति पर झूठे आरोप लगाना अब उनके स्वभाव में आ गया है।”

3. धर्मेंद्र प्रधान (शिक्षा मंत्री):

“राहुल गांधी ने राजनीति के न्यूनतम स्तर को पार कर लिया है। उन्होंने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए संवेदनशील मुद्दे और दिवंगत नेताओं का सहारा लिया।”

4. जयवीर शेरगिल (बीजेपी प्रवक्ता):

“राहुल गांधी की राजनीतिक हताशा अब उन लोगों को भी नहीं बख्श रही जो हमारे बीच नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट से फटकार के बावजूद वे सबक नहीं ले रहे।”

राहुल गांधी के पुराने विवादित बयान

यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी पर दिवंगत नेताओं के नाम का राजनीतिक इस्तेमाल करने का आरोप लगा हो:

मनोहर पर्रिकर विवाद (2019):

राहुल गांधी ने दावा किया कि बीमार अवस्था में मनोहर पर्रिकर ने उनसे कहा था कि राफेल डील में उनका कोई हाथ नहीं था। पर्रिकर ने इस बयान को खारिज करते हुए एक सार्वजनिक पत्र में कहा:

“हमारी मुलाकात के दौरान राफेल का कोई ज़िक्र नहीं हुआ।”

भूमि अधिग्रहण मुद्दा:

मार्च 2024 में कांग्रेस ने वीडियो जारी किया जिसमें राहुल गांधी कहते हैं:

“अरुण जेटली ने मुझे ज़मीन अधिग्रहण पर बोलने से मना किया था, बोले केस करेंगे। मैंने कहा- लगाइए केस।”

यह वीडियो उस समय का है जब अरुण जेटली जीवित थे। लेकिन कृषि कानूनों से इसका कोई संबंध नहीं है।


कृषि कानूनों का संक्षिप्त इतिहास

तारीखघटनाक्रम
3 जून 2020कैबिनेट मीटिंग में 3 अध्यादेशों को मंज़ूरी
5 जून 2020अध्यादेश जारी
14 सितंबर 2020कृषि बिल लोकसभा में पेश
17-20 सितंबर 2020संसद में पास
नवंबर 2020किसान आंदोलन की शुरुआत
21 नवंबर 2021प्रधानमंत्री मोदी ने कानून वापस लेने की घोषणा की

विश्लेषण: राजनीतिक बयानबाज़ी या तथ्यहीन दावा?

राहुल गांधी के बयान ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या विपक्षी नेता सार्वजनिक मंचों पर तथ्य-जांच के बिना बयान देने के आदी हो गए हैं? इस बयान के ज़रिए राहुल गांधी शायद सरकार को कठघरे में खड़ा करना चाहते थे, लेकिन यह दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है।

बीजेपी ने इसे कांग्रेस की “राजनीतिक हताशा” बताया है। वहीं आम जनता के बीच भी यह सवाल उठता है कि क्या दिवंगत नेताओं का नाम लेकर राजनीति करना उचित है?


निष्कर्ष: संयम ज़रूरी है

राहुल गांधी के बयान को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है, वह बताता है कि सार्वजनिक जीवन में तथ्यों की शुद्धता कितनी अहम होती है। राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उन लोगों को घसीटना जो अब जवाब नहीं दे सकते, मर्यादा के खिलाफ है।

राजनीति में वाद-विवाद ज़रूरी है लेकिन तथ्यों और संवेदनशीलता की सीमा लांघना नहीं।

Image Source – BBC NEWS

राहुल गांधी और अरुण जेटली विवाद पर बयान देते हुए बीजेपी नेता और प्रतिक्रिया देने वाले राजनेता

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