“मुंबई लोकल सीट विवाद: ‘मराठी बोलो या बाहर निकलो’ से भड़का भाषा विवाद”
मुंबई लोकल सीट विवाद 20 जुलाई 2025 की शाम उस समय सामने आया जब Central Railway की एक लोकल ट्रेन के महिला डिब्बे में मामूली बहस अचानक भाषा-संवेदनशील मुद्दा बन गई। शुरुआत में दो या तीन यात्रियों के बीच एक सीट पर बहस थी, लेकिन यह बातचीत कई महिलाओं में फैल गई और मौके पर मौजूद एक महिला ने जोर देकर कहा:
“मुंबई में रहना है तो मराठी बोलो, वरना बाहर निकल जाओ।”
यह बात सुनते ही कुछ और महिलाएं भी इस बहस में शामिल हो गईं और मामला सिर्फ सीट नहीं बल्कि भाषा, पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता तक पहुंच गया ।
वीडियो वायरल
एक 17-सेकंड का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें महिलाओं का तीखा स्वर देखा और सुना जा सकता है। वीडियो में महिला द्वारा मराठी भाषा की मांग जोरशोर से की गई, जिससे बहस “मराठी बनाम हिंदी” की धार पर पहुँच गई ।
रेलवे पुलिस की कार्रवाई
रेलवे की सुरक्षा एजेंसियों — RPF और GRP — ने घटना की पुष्टि की है, साथ ही इस बात की जानकारी दी कि इस लड़ाई के किसी भी involved व्यक्ति ने अभी तक आधिकारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई है ।
GRP टीम, विशेष रूप से Kurla GRP, उस ट्रेन में मौजूद यात्रियों से मामले में पूछताछ कर रही है और वीडियो में दिख रही महिलाओं की पहचान के प्रयास कर रही है ।
महाराष्ट्र में बढ़ते भाषा-संवेदनशीलता का परिप्रेक्ष्य
यह घटना महाराष्ट्र में वर्तमान समय में चल रहे भाषा-विरोधों की एक और कड़ी है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के कुछ सदस्यों की द्वारा मराठी भाषा न बोलने वालों पर की गई कार्रवाईयों के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।
विक्रोली में एक दुकान वाला MNS कार्यकर्ताओं की तीखी प्रतिक्रिया का शिकार हुआ, उसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी ।
ठाणे में एक स्ट्रीट फूड विक्रेता को मराठी न बोलने पर थप्पड़ मारा गया और उसे धमकाया गया ।
पालघर जिले में एक ऑटो चालक को मराठी न बोलने पर राजनीतिक समूहों ने निशाना बनाया ।
सामाजिक और राजनैतिक प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया और जनमानस में इस घटना को लेकर व्यापक बहस छिड़ी हुई है। अधिकांश लोग इसे मुंबई जैसी बहुध्रुवीय-बहुभाषी महानगर के लिए चिंताजनक संकेत मान रहे हैं।
कुछ लोग इसे व्यक्तिगत असभ्यता मानते हैं, जबकि अन्य इसे भाषा आधारित असहिष्णुता के एक स्वरूप के रुप में देखते हैं।
राजनीतिक रूप से ध्यान देने वाला पहलू यह है कि MNS को अक्सर मराठी भाषा प्रमोट करने वाले प्रयासों के कारण वोट-बैंक राजनीति या भाषा-आधारित अपमान के घटकों के अंग के रूप में देखा जाता है।
विश्लेषण: क्या यह केवल भाषा की लड़ाई है?
भाषा अस्मिता: महाराष्ट्र में मराठी मातृभाषा है, और इसे राज्य की पहचान से जोड़कर देखा जाता है।
महानगर का बहुभाषीय स्वरूप: मुंबई जैसे महानगर में हिंदी, मराठी, अंग्रेज़ी, गुजराती, उर्दू जैसी कई भाषाएं समान आदर के साथ बोलने वाले लोग रहते हैं।
ट्रेन का सार्वजनिक स्थान: लोकल ट्रेनों में छोटे विवाद सामान्य हैं, लेकिन जब इन मामूली मामलों में क्षेत्रीय अस्मिताओं की लड़ाई जुड़ जाती है, तो समस्या बिगड़ सकती है।
उपयुक्त प्रतिक्रिया का अभाव: जब तक कोई शिकायत दर्ज नहीं होती और संबंधित अधिकारियों कीIGNORE कार्रवाई नहीं होती, तब तक ऐसी प्रवृत्तियाँ बढ़ सकती हैं।
जरूरी कदम
- पुलिस जांच तेज़ करें — जिन महिलाओं ने अशिष्ट भाषा-आचरण किया, उन्हें पहचान कर उचित कार्रवाई होनी चाहिए।
- जागरूकता अभियान — भाषा-संवेदनशीलता के लिए सार्वजनिक जगहों पर ‘सीवियरिंग थिंकिंग’ वर्कशॉप आयोजित करें।
- सदाचार को बढ़ावा — ट्रेन यात्रियों को अधिक सजग, सहिष्णु और सहायक बनाने के लिए सार्वजनिक शिक्षा बढ़ें।
- बहुभाषा सम्मान — मुंबई जैसे महानगर में सभी भाषाओं को आदर दें और मराठी भाषा को प्रेमपूर्वक अपनाएं, न कि जोर-ज़बरदस्ती।
निष्कर्ष
मुंबई लोकल की यह घटना सिर्फ एक छोटी सीट विवाद नहीं, बल्कि भाषा-आधिनता, पहचान और महानगरों की बहुभाषी सहअस्तित्व की जटिलताओं का प्रतीक बन गयी है। मराठी भाषा का आदर जीवन के किसी भी क्षेत्र में लगभग सार्वभौमिक रूप से सम्माननीय है, लेकिन इस आदर की सीमा तभी सही है जब वह जन्म या मूल धर्म की तरह नहीं बन जाए।
मुंबई एक ऐसी बहुभाषीय राजधानी रही है जहाँ मराठी, हिंदी, अंग्रेज़ी, गुजराती और अन्य भाषाओं के बीच सामंजस्य रहा है। अगर हम यह सामंजस्य खो देंगे, तो हमारी महानगर संकीर्णता की ओर बढ़ेगा।
पुलिस की तेज़ और निष्पक्ष कार्रवाई, नागरिकों की सहिष्णुता और समाज का संयम ही इस घटना को सिर्फ एक अफसोसजनक यादगार बना सकता है, न कि एक विभाजनकारी घटना।


