भारत-अमेरिका का संयुक्त मिशन: ‘निसार’ सैटेलाइट लॉन्च, अब भूकंप-सुनामी पर रहेगी बाज जैसी नज़र
निसार सैटेलाइट क्या है?
भारत और अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसियों—ISRO (इसरो) और NASA (नासा)—ने मिलकर एक क्रांतिकारी सैटेलाइट लॉन्च किया है, जिसे नाम दिया गया है NISAR (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar)। यह सैटेलाइट पृथ्वी पर होने वाले बेहद सूक्ष्म बदलावों की निगरानी करने में सक्षम है। निसार मिशन का उद्देश्य पृथ्वी के भौगोलिक परिवर्तनों पर नज़र रखना और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की तैयारियों में सहायता करना है।
निसार मिशन की लॉन्च डिटेल
लॉन्च तारीख: 30 जुलाई 2025
स्थान: सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा, भारत
वज़न: 2,392 किलोग्राम
रॉकेट: GSLV S-16
ऑर्बिट: लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) — 747 किलोमीटर की ऊंचाई
नासा और इसरो की ऐतिहासिक साझेदारी
भारत की अंतरिक्ष एजेंसी ISRO की स्थापना 1969 में हुई थी, जबकि अमेरिका की NASA की शुरुआत 1958 में हुई। दोनों ही संस्थाएं अपने-अपने देश में अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी रही हैं। लेकिन यह पहली बार है जब दोनों एजेंसियां इतने उच्चस्तरीय अर्थ-ऑब्ज़र्वेशन मिशन पर एक साथ काम कर रही हैं।
निसार मिशन पर काम की शुरुआत 2014 में हुई थी, जब इसरो और नासा ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। हालांकि इसे 2024 में लॉन्च किया जाना था, लेकिन तकनीकी कारणों से यह 2025 में जाकर संभव हुआ।
क्या करेगा ‘निसार’?
- हर 12 दिन में दो बार पूरी पृथ्वी का मैप तैयार करेगा।
- धरती की सतह, बर्फ, महासागर, वन क्षेत्र, कृषि भूमि—इन सभी पर नजर रखेगा।
- भूकंप, ज्वालामुखी, सुनामी और भूस्खलन जैसे आपदाओं के संकेत पहले से पहचान सकेगा।
- जलवायु परिवर्तन, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और ग्लेशियरों के पिघलने की जानकारी देगा।
- बैथोमेट्रिक सर्वे के माध्यम से समुद्र के अंदर की गहराई में हो रहे बदलावों की स्टडी करेगा।
डुअल राडार सिस्टम से लैस है ‘निसार’
निसार दुनिया का पहला डुअल फ्रिक्वेंसी राडार सैटेलाइट है, जिसमें दो तरह के राडार लगे हैं:
- एल-बैंड राडार (NASA द्वारा विकसित)
- एस-बैंड राडार (ISRO द्वारा विकसित)
यह डुअल राडार सिस्टम पृथ्वी की सतह के बदलावों को बेहद सटीकता से पकड़ने में सक्षम है।

हर मौसम में करेगा काम – क्या है SAR तकनीक?
निसार सैटेलाइट में SAR (Synthetic Aperture Radar) तकनीक का इस्तेमाल हुआ है। यह माइक्रोवेव सिग्नल का उपयोग कर खुद अपनी ‘रोशनी’ बनाता है, जिससे यह सैटेलाइट दिन हो या रात, बारिश हो या बादल—हर मौसम में काम करने में सक्षम है।
सन-सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट क्या है?
निसार को Sun-Synchronous Polar Orbit में स्थापित किया गया है। इसका अर्थ है कि यह पृथ्वी के एक ही हिस्से से एक निश्चित समय पर बार-बार गुज़रेगा। इससे रेगुलर मैपिंग और बदलावों की तुलना करना आसान हो जाएगा।
किन बदलावों पर नज़र रखेगा निसार?
- धरती की सतह में दरारें और धंसाव
- ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में बर्फ की परतों का पिघलना
- समुद्री जलस्तर में बढ़ोतरी
- खेती के पैटर्न में बदलाव
- जंगलों में आग लगने की संभावनाएं
- पुलों और इमारतों की संरचनात्मक स्थिरता
- पिघलते ग्लेशियर और उनका प्रभाव
सिर्फ भारत-अमेरिका नहीं, पूरी दुनिया को फायदा
इस सैटेलाइट से इकट्ठा किया गया डेटा सिर्फ भारत और अमेरिका नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के रिसर्च संस्थानों के लिए उपलब्ध रहेगा। इसका उपयोग जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन, भू-वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरणीय निगरानी के लिए किया जाएगा।
कब से शुरू होगा डेटा संग्रह?
निसार को पूरी तरह तैनात होने और परीक्षण में लगभग 90 दिन लगेंगे। इसके बाद यह वास्तविक डेटा संग्रह और ट्रांसमिशन का काम शुरू करेगा
कितना खर्च आया इस मिशन पर?
भारत और अमेरिका ने मिलकर इस पर लगभग 1.5 अरब डॉलर (लगभग 12,000 करोड़ रुपये) खर्च किए हैं, जो इसे अब तक का सबसे महंगा अर्थ ऑब्ज़र्वेशन सैटेलाइट मिशन बनाता है।
वैज्ञानिकों की मेहनत और कोविड का संघर्ष
नासा की अर्थ साइंसेज़ डायरेक्टर केरेन सेंट जर्मेन ने बताया कि इस सैटेलाइट को कोविड-19 महामारी के समय दो अलग-अलग देशों में मौजूद वैज्ञानिकों ने मिलकर तैयार किया। यह दर्शाता है कि अंतरिक्ष विज्ञान में सहयोग सीमाओं से परे जा सकता है।
निष्कर्ष: ‘निसार’ बदल सकता है आपदा प्रबंधन का भविष्य
निसार मिशन, ISRO और NASA का एक ऐतिहासिक कदम है जो धरती पर हो रहे परिवर्तनों को समझने, आपदाओं से पहले अलर्ट सिस्टम विकसित करने, और जलवायु संकट से जूझने की तैयारियों में एक बड़ी भूमिका निभाएगा।
यह सिर्फ एक तकनीकी प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक वैश्विक चेतावनी और समाधान प्रणाली है—जो दुनिया को बदल सकती है।
Image source – NASA

