कौन था चोल वंश का शासक, जिसका दबदबा इंडोनेशिया तक फैला?
राजेंद्र चोल: दक्षिण भारत के महान सम्राट जिनका साम्राज्य इंडोनेशिया तक फैला
भारत के इतिहास में कई ऐसे सम्राट हुए जिन्होंने न केवल अपने राज्य का विस्तार किया, बल्कि विश्व पटल पर भी अपनी पहचान दर्ज कराई। इन्हीं में से एक थे राजेंद्र चोल प्रथम — चोल वंश के महान शासक, जिन्होंने न केवल दक्षिण भारत पर बल्कि समुद्र पार इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड और सुमात्रा तक अपना परचम लहराया।
चोल साम्राज्य की नींव और प्रारंभिक विस्तार
वर्ष 850 ईस्वी के आसपास, दक्षिण भारत में पांड्यों और पल्लवों के बीच संघर्ष का लाभ उठाकर एक अपेक्षाकृत अज्ञात राजा विजयालय चोल ने तंजावुर पर अधिकार कर लिया।
यही घटना चोल साम्राज्य की स्थापना का आधार बनी।
सन 907 ईस्वी में पारंतक प्रथम गद्दी पर बैठे और लगभग 48 वर्षों तक शासन किया। हालांकि, उनके बाद कुछ कमजोर शासकों के कारण साम्राज्य की शक्ति घटने लगी।
राजराजा चोल से पुनर्जागरण की शुरुआत
सन 985 ईस्वी में राजराजा चोल प्रथम ने सत्ता संभाली। उन्होंने चोल साम्राज्य को पुनः मजबूत किया और दक्षिण भारत में एक बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित किया।
उनके कार्यकाल में प्रशासन, सेना और नौसेना सभी ने नई ऊंचाइयां हासिल कीं।
राजेंद्र चोल प्रथम का सिंहासनारोहण
राजराजा चोल के पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम ने 1014 ईस्वी में गद्दी संभाली।
उन्होंने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए साम्राज्य को और भी विशाल बनाया।
उनके शासनकाल में चोल साम्राज्य मालदीव से लेकर बंगाल के गंगा तट तक फैल गया और समुद्र पार जाकर दक्षिण-पूर्व एशिया में भी अपनी छाप छोड़ी।
श्रीविजय साम्राज्य से टकराव
11वीं सदी की शुरुआत में, बंगाल की खाड़ी के आसपास के व्यापार मार्गों पर चोल और खमेर साम्राज्यों का नियंत्रण था।
लेकिन एक बड़ी बाधा था — श्रीविजय साम्राज्य (मौजूदा इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर के हिस्से)।
श्रीविजय के शासक समुद्री व्यापार मार्गों पर कर लगाते थे और न मानने वालों पर हमला कर देते थे।
राजेंद्र चोल ने जब यह जाना कि श्रीविजय चीन में चोलों की छवि बिगाड़ रहे हैं, तो उन्होंने 1017 ईस्वी में पहला नौसैनिक अभियान चलाया और श्रीविजय के राजा विजयतुंगवर्मन को बंदी बना लिया। बाद में दोनों के बीच समझौता हुआ और श्रीविजय ने चोलों की अधीनता स्वीकार की।

श्रीलंका और मालदीव पर विजय
गद्दी संभालने के कुछ साल बाद ही राजेंद्र ने 1017 ईस्वी में श्रीलंका पर हमला किया।
इस विजय के बाद पहली बार पूरा श्रीलंका द्वीप चोल साम्राज्य के नियंत्रण में आ गया।
इसके तुरंत बाद 1018 ईस्वी में मालदीव और लक्षद्वीप को भी चोल साम्राज्य का हिस्सा बना लिया गया।
गंगा अभियान और ‘गंगईकोंड’ की उपाधि
सन 1022 ईस्वी में राजेंद्र चोल ने उत्तर की ओर एक विशाल अभियान चलाया।
उन्होंने ओडिशा, बंगाल और पाल वंश के शक्तिशाली राजा महिपाल को पराजित किया।
इसके बाद उन्होंने गंगा नदी का पवित्र जल दक्षिण भारत लाकर एक विशाल कृत्रिम झील में डलवाया।
इस विजय के प्रतीक के रूप में उन्होंने खुद को “गंगईकोंड” (गंगा को जीतने वाला) की उपाधि दी और गंगईकोंड चोलपुरम को राजधानी बनाया।

सुमात्रा तक ऐतिहासिक नौसैनिक अभियान
सन 1025 ईस्वी में राजेंद्र चोल ने इतिहास का एक अभूतपूर्व विदेशी नौसैनिक अभियान चलाया।
उन्होंने श्रीविजय साम्राज्य के सुमात्रा, मलेशिया, थाईलैंड के कई बंदरगाहों और रणनीतिक स्थलों पर कब्जा कर लिया।
इतिहासकारों का मानना है कि यह अभियान किसी भी दक्षिण एशियाई साम्राज्य द्वारा देश की सीमाओं से बाहर किया गया सबसे लंबी दूरी का सैन्य अभियान था।
इस जीत के बाद चोल साम्राज्य का दबदबा पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थापित हो गया।

चीन और खमेर साम्राज्य के साथ संबंध
राजेंद्र चोल ने चीन के साथ गहरे व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध बनाए।
उन्होंने चीन के लिए हाथीदांत, मोती, गुलाब जल और रेशमी वस्त्र भेजे, और चीन के ग्वांगझो शहर में एक मंदिर का निर्माण भी करवाया।
खमेर साम्राज्य (मौजूदा कंबोडिया, थाईलैंड, वियतनाम के हिस्से) के साथ भी चोलों के घनिष्ठ संबंध थे।
अंगकोरवाट जैसे भव्य मंदिर के निर्माण काल में चोल और खमेर एक-दूसरे के सहयोगी थे।
समुद्री शक्ति और व्यापार
राजेंद्र चोल की नौसेना को उस समय एशिया की सबसे ताकतवर नौसेनाओं में गिना जाता था।
उनका उद्देश्य केवल विजय पाना नहीं था, बल्कि समुद्री व्यापार मार्गों पर नियंत्रण स्थापित करना भी था।
मसाले, मोती, रेशम, सुगंधित लकड़ियां और सोना जैसे कीमती सामान तमिलनाडु के बंदरगाहों से विश्वभर में पहुंचते थे।
स्थापत्य कला और धार्मिक योगदान
राजेंद्र चोल ने राजधानी गंगईकोंड चोलपुरम में शिव को समर्पित एक भव्य मंदिर बनवाया, जो चोल वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है।
उन्होंने मदुरै, रामेश्वरम और श्रीरंगम जैसे धार्मिक स्थलों का भी विकास करवाया।
उनके शासनकाल में कई गुरुकुल स्थापित हुए, जहां संस्कृत और तमिल भाषा की शिक्षा दी जाती थी।
राजेंद्र चोल की प्रशासनिक नीतियां
वे न केवल योद्धा थे बल्कि कुशल प्रशासक भी थे।
उनके शासन में भूमि सर्वेक्षण, कर व्यवस्था और गांव स्तर पर प्रशासनिक ढांचा अत्यंत संगठित था।
उन्होंने मंदिरों को सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित किया।
विरासत और ऐतिहासिक महत्व
राजेंद्र चोल प्रथम की उपलब्धियां केवल क्षेत्रीय विस्तार तक सीमित नहीं थीं।
उन्होंने दक्षिण भारत को विश्व व्यापार और संस्कृति के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया।
उनकी समुद्री शक्ति, प्रशासनिक कौशल और स्थापत्य कला ने चोल साम्राज्य को स्वर्ण युग में पहुंचा दिया।
निष्कर्ष
राजेंद्र चोल प्रथम एक ऐसे सम्राट थे जिन्होंने न केवल धरती पर बल्कि समुद्र पर भी अपना आधिपत्य स्थापित किया।
उनका साम्राज्य भारत से लेकर इंडोनेशिया तक फैला था और उनका नाम आज भी दक्षिण भारत की गौरवगाथा के रूप में लिया जाता है।
उनके नेतृत्व में चोल साम्राज्य ने जो उन्नति की, वह मध्यकालीन भारतीय इतिहास के सबसे शानदार अध्यायों में गिनी जाती है।


