सुराना गांव: जहां रक्षाबंधन के दिन मनाया जाता है शोक, नहीं बंधती राखी
जब पूरे देश में करोड़ों भाई-बहन प्रेम और विश्वास का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मना रहे होंगे, तब उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद ज़िले के मुरादनगर क्षेत्र का सुराना गांव बिल्कुल अलग माहौल में होगा। यहां भाइयों की कलाई पर राखी नहीं बंधेगी, मिठाइयों का आदान-प्रदान नहीं होगा, और न ही खुशी का उत्सव दिखाई देगा। इसके बजाय यहां के लोग इस दिन को शोक दिवस के रूप में मनाते हैं। इसकी वजह सैकड़ों साल पुरानी एक ऐसी घटना है जिसने गांव की स्मृतियों पर हमेशा के लिए दर्द का निशान छोड़ दिया।
सदियों पुरानी परंपरा: राखी का त्याग
सुराना गांव हरनंदी नदी के किनारे, दिल्ली-मेरठ मार्ग से लगभग 14 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां के लोग मानते हैं कि रक्षाबंधन उनके पूर्वजों के लिए अशुभ साबित हुआ था। वर्षों से इस दिन किसी भी प्रकार का उत्सव नहीं मनाया जाता, बल्कि गांववासी सामूहिक रूप से अपने शहीद पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, अतीत में कुछ लोगों ने रक्षाबंधन का पर्व मनाने की कोशिश की थी, लेकिन उन वर्षों में गांव में दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं घटित हो गईं। इसी कारण से यह परंपरा टूटने के बजाय और गहरी हो गई।
सुराना गांव का इतिहास और नाम की उत्पत्ति
ऐतिहासिक कथाओं के अनुसार, सुराना गांव मूल रूप से छबड़िया गोत्र के यदुवंशी अहीरों द्वारा बसाया गया था। यह समुदाय लगभग 1106 ईस्वी के आसपास राजस्थान के अलवर क्षेत्र से यहां आकर बसा। वीरता और युद्ध कौशल में माहिर होने के कारण उन्होंने गांव का नाम “सौराणा” रखा — जिसमें “सौ” और “रण” शब्दों का मेल था, जो कालांतर में बदलकर सुराना हो गया।
1192 की त्रासदी: खूनी रक्षाबंधन
सुराना गांव की इस अनूठी परंपरा की जड़ें 1192 ईस्वी के इतिहास में छिपी हैं। उस समय तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गौरी ने पराजित कर दिया था। चौहान की सेना के कुछ अहीर-यादव सैनिक युद्ध से बचकर सुराना गांव में शरण लेने आ पहुंचे।
इन सैनिकों का पीछा करते हुए मोहम्मद गौरी अपनी 50,000 सैनिकों की विशाल सेना के साथ सुराना पहुंचा। उसने गांव को चारों ओर से घेर लिया और यदुवंशियों को चेतावनी दी कि वे शरणागत सैनिकों को उसके हवाले कर दें, अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहें।
यदुवंशियों की शौर्यगाथा
यदुवंशी योद्धाओं के लिए “शरणागत की रक्षा” सम्मान और धर्म का विषय था। उन्होंने किसी भी कीमत पर उन सैनिकों को न सौंपने का निश्चय किया। रक्षाबंधन के दिन, अपनी बहनों से राखी बंधवाने के बाद, वीर योद्धा केसरी बाना पहनकर युद्धभूमि की ओर निकल पड़े।
सैंकड़ों की संख्या में यदुवंशी, गौरी की विशाल सेना के सामने डटे और अंतिम सांस तक लड़े। इस असमान युद्ध में लगभग सभी वीर शहीद हो गए। इसके बाद गौरी के आदेश पर गांव में बचे हुए बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे भी मार दिए गए।
रक्षाबंधन का बदलता अर्थ
यह नरसंहार रक्षाबंधन के दिन हुआ था, जो आमतौर पर भाई-बहन के रिश्ते में सुरक्षा और प्रेम का पर्व माना जाता है। लेकिन सुराना गांव के लिए यह दिन एक खूनी स्मृति बनकर रह गया। तब से लेकर आज तक गांववासी इसे उत्सव की तरह नहीं, बल्कि शोक के रूप में मानते हैं।
इस दिन यहां कोई सजावट नहीं होती, न मिठाइयां बंटती हैं, और न ही राखी बंधाई जाती है। इसके बजाय लोग अपने शहीद पूर्वजों की वीरता को याद करते हैं और उनके बलिदान के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं।
इतिहास की जीवंत कहानी
स्थानीय लोग बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने अपने धर्म, सम्मान और शरणागत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दी थी। यह कथा पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाई जाती है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उस बलिदान को याद रखें और सम्मान करें।
सुराना गांव का यह अद्वितीय इतिहास न केवल स्थानीय परंपरा का हिस्सा है, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में हुए उन अनेक संघर्षों की भी झलक दिखाता है, जिनमें वीरता, बलिदान और आत्मसम्मान सर्वोपरि थे।

