भारतीय सेना की ड्रोन बटालियन: क्या पाकिस्तान पर मिलेगी रणनीतिक बढ़त?
भारतीय सेना ड्रोन बटालियन की घोषणा के साथ ही पाकिस्तान के खिलाफ भारत ने भविष्य के युद्धों की तैयारी में एक बड़ा कदम उठाया है। मई 2025 में हुए संघर्ष के बाद थल सेना ने यह निर्णय लिया कि आर्टिलरी, इन्फैंट्री और आर्मर्ड डिवीज़न में विशेष ड्रोन बटालियन बनाई जाए, जो केवल निगरानी और हमले के लिए जिम्मेदार होंगी।
मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सीमावर्ती संघर्ष के बाद भारतीय थल सेना ने भविष्य के युद्धों को ध्यान में रखते हुए एक नई रणनीति अपनाने का फैसला किया है। इस योजना के तहत सेना के विभिन्न अंगों — आर्टिलरी, इन्फैंट्री और आर्मर्ड डिवीज़न — में विशेष ‘ड्रोन बटालियन’ तैयार की जा रही है। इन नई इकाइयों का मुख्य उद्देश्य केवल ड्रोन संचालन होगा, ताकि युद्ध के समय निगरानी और हमले दोनों में इनका प्रभावी उपयोग किया जा सके।
ड्रोन बटालियन का स्वरूप और जिम्मेदारियां
सेना के उच्च अधिकारियों के अनुसार, इन यूनिट्स में चयनित सैनिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को उच्च स्तरीय ड्रोन ऑपरेशन ट्रेनिंग दी जाएगी। 26 जुलाई 2025 को ‘कारगिल विजय दिवस’ पर सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने 30 नई लाइट कमांडो बटालियनों और अत्याधुनिक हथियारों से लैस ‘रुद्र ब्रिगेड’ के गठन की भी घोषणा की थी, जिसमें ड्रोन प्रमुख भूमिका निभाएंगे।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ड्रोन बटालियन बनाने की योजना पहले से विचाराधीन थी, लेकिन हाल के संघर्ष और वैश्विक युद्धों में ड्रोन की सफलता ने इस निर्णय को गति दी। बीते दशक में यूक्रेन-रूस युद्ध, अज़रबैजान-आर्मीनिया संघर्ष और पश्चिम एशिया में हुई लड़ाइयों में ड्रोन ने युद्ध का स्वरूप ही बदल दिया है।

क्यों अहम हैं ड्रोन?
रक्षा विश्लेषक राहुल बेदी बताते हैं कि ड्रोन न केवल सटीक हमले करने में सक्षम हैं, बल्कि यह अपेक्षाकृत कम लागत में अरबों रुपये के टैंकों या अन्य भारी हथियारों को भी निष्क्रिय कर सकते हैं। भारतीय सेना जो नई ब्रिगेड बना रही है, उसमें लगभग 25 से 100 प्रशिक्षित सैनिक होंगे, जिनका काम केवल ड्रोन संचालन और तकनीकी प्रबंधन होगा।
इन बटालियनों में दो प्रकार के ड्रोन शामिल होंगे:
- अटैक ड्रोन – जो लक्ष्यों पर सीधे हमला कर सकते हैं, चाहे अकेले हों या 20-25 ड्रोन के समूह में।
- सर्विलांस ड्रोन – जो दुश्मन की लोकेशन, मूवमेंट और संसाधनों की पहचान करके अटैक ड्रोन को सटीक जानकारी देंगे।
ड्रोन की श्रेणियां और भारत की ताकत
ड्रोन आमतौर पर तीन श्रेणियों में विभाजित होते हैं:
- कम दूरी वाले ड्रोन – 20 से 50 किलोमीटर तक संचालन क्षमता।
- मध्यम और उच्च क्षमता वाले ड्रोन – लंबी दूरी और ऊंचाई पर निगरानी या हमला करने में सक्षम।
- अत्याधुनिक अटैक ड्रोन – जैसे अमेरिका का MQ-9B, जो लंबी दूरी तक उड़ान भरते हुए सटीक हमले कर सकता है।
भारत ने हाल ही में अमेरिका से 31 MQ-9B ड्रोन 3.5 अरब डॉलर की लागत से खरीदे हैं। इसके अलावा 1990 के दशक से इसराइल से हार्पी, हैरोप और हैरोन ड्रोन भी खरीदे गए हैं, जो ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान अहम साबित हुए। साथ ही, भारत स्वदेशी ड्रोन निर्माण में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।
ड्रोन का इस्तेमाल अब केवल हमले तक सीमित नहीं है, बल्कि लद्दाख़ और अरुणाचल प्रदेश जैसे ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिकों तक युद्ध सामग्री और रसद पहुंचाने में भी किया जा रहा है।

वैश्विक स्तर पर ड्रोन तकनीक
ड्रोन तकनीक में इसराइल, अमेरिका और चीन सबसे आगे हैं। इसराइल ने सबसे पहले उन्नत ड्रोन बनाए, अमेरिका ने इसे और परिष्कृत किया और अब चीन इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। तुर्की भी ‘ड्रोन सुपर पावर’ के रूप में उभर रहा है और अज़रबैजान-आर्मीनिया युद्ध में उसने अपनी तकनीक का प्रभावी प्रदर्शन किया।
पाकिस्तान की ड्रोन क्षमता
हाल ही के संघर्ष में पाकिस्तान ने चीन और तुर्की निर्मित ड्रोन का उपयोग किया। विशेषज्ञों का मानना है कि हाईटेक ड्रोन वॉरफेयर अब भविष्य के युद्धों की मुख्य धुरी बनते जा रहे हैं। पहले जहां पैदल सेना की प्रत्यक्ष भिड़ंत आम थी, अब उसे कॉन्टैक्ट वॉरफेयर से बदलकर रिमोट और मशीन-कंट्रोल वॉरफेयर का रूप दिया जा रहा है।
राहुल बेदी के अनुसार, पायलट वाले विमानों की तुलना में मशीन-कंट्रोल ड्रोन से गलती की संभावना बेहद कम होती है। भविष्य के युद्धों में इंसानों की भूमिका घटेगी और मशीनों की निर्भरता बढ़ेगी। जो देश सबसे आधुनिक तकनीक अपनाएगा और उस पर नियंत्रण रखेगा, वही बढ़त हासिल करेगा।
क्या इससे पाकिस्तान पर बढ़त मिलेगी?
सैन्य मामलों के जानकार और पत्रिका ‘फ़ोर्स’ के संपादक प्रवीण साहनी इस पर अलग दृष्टिकोण रखते हैं। उनका कहना है कि ड्रोन बटालियन बनाना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इससे तुरंत पाकिस्तान पर निर्णायक बढ़त मिलना मुश्किल है।
उनके अनुसार, जब तक भारत के पास अपना 24×7 निगरानी करने वाला सैटेलाइट नेटवर्क नहीं होगा, तब तक ड्रोन पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाएंगे। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में चीन के सैटेलाइट नेटवर्क ने पाकिस्तान को चौबीसों घंटे भारत की सैन्य गतिविधियों की निगरानी करने में मदद की, जिससे उन्हें हमारी पोजीशन और मूवमेंट का पता चलता रहा।
प्रवीण साहनी का तर्क है कि ड्रोन तभी कारगर होते हैं जब युद्ध के मैदान की पूरी और सटीक जानकारी हो। अगर दोनों पक्ष को एक-दूसरे की स्थिति का स्पष्ट अंदाजा नहीं है, तो लड़ाई मिसाइल और रॉकेट जैसे हथियारों पर ही आधारित रहेगी, जिनकी पहुंच व्यापक है।
भारतीय सेना की प्राथमिक जरूरतें
उनके अनुसार, फिलहाल भारतीय सेना के लिए तीन प्रमुख प्राथमिकताएं होनी चाहिए:
- उन्नत सैटेलाइट निगरानी प्रणाली – जिससे युद्धक्षेत्र की चौबीसों घंटे रीयल-टाइम निगरानी हो सके।
- इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमता – जो दुश्मन के संचार और नेविगेशन सिस्टम को बाधित कर सके।
- इंटीग्रेशन ऑफ थ्री सर्विसेज – यानी थल सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच पूर्ण समन्वय।
वे यह भी कहते हैं कि 2020 से ‘इंटीग्रेटेड थिएटर कमांड’ की बात हो रही है, लेकिन इस पर अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। सेना का आधुनिकीकरण तभी सफल होगा जब यह तीनों अंग एकीकृत ढंग से काम करेंगे।
निष्कर्ष
भारतीय सेना की नई ड्रोन बटालियन निश्चित रूप से युद्ध तकनीक में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह सेना की निगरानी और सटीक हमले की क्षमता को बढ़ाएगी, खासकर ऊंचाई और दुर्गम क्षेत्रों में। लेकिन, केवल ड्रोन पर निर्भर रहकर पाकिस्तान या किसी भी प्रतिद्वंदी पर निर्णायक बढ़त हासिल करना संभव नहीं होगा।
जब तक भारत के पास स्वदेशी सैटेलाइट नेटवर्क, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमता और तीनों सेनाओं का पूर्ण समन्वय नहीं होगा, तब तक ड्रोन का प्रभाव सीमित रहेगा। आने वाले वर्षों में इन सभी क्षेत्रों में संतुलित निवेश और विकास ही भारत को भविष्य के युद्धों में वास्तविक बढ़त दिला सकता है।
image source – bbc news
