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धड़क 2: हिंदी सिनेमा में जाति और भेदभाव की सच्चाई को सामने लाने वाली फिल्म

भारतीय सिनेमा में जब भी सामाजिक मुद्दों की बात होती है, तो जाति आधारित भेदभाव का विषय शायद ही कभी बड़े पर्दे पर गहराई से दिखाया जाता है। इसी कमी को पूरा करती है फिल्ममेकर, राइटर और प्रोडक्शन डिज़ाइनर शाज़िया इक़बाल की पहली फीचर फिल्म “धड़क 2”। यह फिल्म भले ही बॉक्स ऑफिस पर मोहित सूरी की सैयारा जितनी कमाई न कर पाई हो, लेकिन इसे भारतीय सिनेमा में एक अहम बदलाव की शुरुआत के तौर पर याद किया जाएगा।

कहानी का मूल और सामाजिक पृष्ठभूमि

‘धड़क 2’ को खास बनाता है इसका नज़रिया, जो जाति आधारित भेदभाव, उत्पीड़न और सामाजिक असमानताओं को ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ पेश करता है। फिल्म के मुख्य किरदार नीलेश अहिरवार (सिद्धांत चतुर्वेदी) एक दलित युवक हैं, जो अपनी जातीय पहचान को समझने और स्वीकारने की कोशिश में है।

हालांकि फिल्म में सिद्धांत के “ब्राउन फेस” लुक को लेकर विवाद भी हुआ, लेकिन कहानी का असली सार इस विवाद से कहीं आगे है। यह फिल्म न तो दलित पात्रों को तरस खाने योग्य दिखाती है और न ही सतही तरीके से मुद्दा उठाती है। बल्कि यह विशेषाधिकार प्राप्त तबके के सामने सवाल खड़े करती है और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है।

फिल्म के दमदार किरदार

मुख्य किरदार के अलावा फिल्म में कई प्रभावशाली पात्र वंचित समुदाय से हैं। इनमें सबसे प्रमुख है शेखर का किरदार, जिसे प्रियांक तिवारी ने निभाया है। यह किरदार रोहित वेमुला से प्रेरित है, जो हैदराबाद विश्वविद्यालय के पीएचडी स्कॉलर थे और जातिगत अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए जाने जाते थे।

फिल्म में शेखर का एक संवाद बेहद असर छोड़ता है – “अन्याय क़ानून बन जाए तो उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना लोगों का कर्तव्य है।”

इसी तरह अनुभा फतेहपुरा ने नीलेश की मां का किरदार निभाया है, जो सामाजिक दबाव और अपमान के बावजूद अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है और आरक्षण व समान अवसर जैसे कदमों में विश्वास रखती है।

तमिल और दक्षिण भारतीय सिनेमा से तुलना

जहां हिंदी सिनेमा में जाति आधारित कहानियां दुर्लभ हैं, वहीं तमिल और अन्य दक्षिण भारतीय फिल्मों में यह विषय लंबे समय से मजबूती से उठाया जाता रहा है।

  • मारी सेल्वराज की कर्णन में सुपरस्टार धनुष ने वंचित तबके की नाराज़गी को आवाज़ दी।
  • लीना मणिमेकलई की मादथी ने लैंगिक हिंसा पर गहरी पड़ताल की।
  • पा. रंजीत की सारपट्टा परंबराई और टी.के. ज्ञानवेल की जय भीम ने जाति के मुद्दों पर बहस को नए स्तर पर पहुंचाया।

तमिलनाडु में यह सामाजिक चेतना पेरियार और द्रविड़ राजनीति की विरासत से जुड़ी है, जहां फिल्मकार खुलकर अपनी कहानियों में जातिगत वास्तविकताओं को पेश करते हैं।

धड़क 2 का स्रोत और नया दृष्टिकोण

‘धड़क 2’ असल में मारी सेल्वराज की चर्चित तमिल फिल्म परीयेरुम पेरुमाल का हिंदी रूपांतरण है। शाज़िया इक़बाल ने इसे उत्तर भारत की पृष्ठभूमि में ढाला और जेंडर के नज़रिए से एक लव स्टोरी के रूप में पेश किया। उनका मानना है कि प्रेम कहानियां समाज के पूर्वाग्रहों और भेदभाव पर असरदार तरीके से बात करने का सबसे मजबूत माध्यम हैं।

हिंदी सिनेमा में जाति का प्रतिनिधित्व – अतीत से वर्तमान तक

हिंदी फिल्मों में दलित पात्रों का इतिहास 1936 की अछूत कन्या से शुरू होता है, जिसमें एक निचली जाति की लड़की और ब्राह्मण लड़के की प्रेम कहानी थी। 1959 में आई बिमल रॉय की सुजाता में भी इसी तरह का विषय था, जहां नूतन ने एक अछूत लड़की का किरदार निभाया।

आगे चलकर 2001 में लगान में ‘कचरा’ नाम का अछूत किरदार दिखा, लेकिन उसका संघर्ष फिल्म का मुख्य विषय नहीं था। 2011 की आरक्षण और 2019 की आर्टिकल 15 ने इस विषय को छुआ, लेकिन दृष्टिकोण मुख्यतः सवर्ण नायकों के इर्द-गिर्द रहा।

इसके विपरीत, पैरेलल सिनेमा में श्याम बेनेगल की अंकुर, सत्यजीत रे की सद्गति, प्रकाश झा की दामुल, और शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन जैसी फिल्मों ने जातिगत असमानताओं को सीधे और गहराई से उठाया।

नीरज घेवान – नई पीढ़ी की आवाज़

हिंदी सिनेमा में दलित निर्देशकों की संख्या बेहद कम है, लेकिन नीरज घेवान इस कमी को चुनौती देते हैं। उनकी पहली फिल्म मसान (2015) और गीली पुच्ची (अजीब दास्तां) ने जाति, जेंडर और सेक्शुअलिटी के मुद्दों को नए नजरिए से पेश किया।

2025 में उनकी फिल्म होमबाउंड भी वंचित और अल्पसंख्यक समुदायों की समस्याओं पर केंद्रित रही, जो कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान पैदल घर लौटने वाले प्रवासियों की कहानी है।

धड़क 2 का महत्व

‘धड़क 2’ को खास बनाता है इसका ईमानदार और बिना लाग-लपेट वाला प्रस्तुतीकरण। यह फिल्म यह संदेश देती है कि आप चाहे गांव में हों या बड़े शहर में, आपकी जातीय पहचान आपका पीछा नहीं छोड़ती।

यह फिल्म सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संरचना, भेदभाव और विशेषाधिकार की परतों को खोलने वाली सिनेमाई कोशिश है। यह बॉलीवुड में दुर्लभ है, लेकिन इसकी शुरुआत उम्मीद देती है कि आने वाले समय में और भी फिल्में इस दिशा में कदम बढ़ाएंगी।

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