धर्म

कराची से लाहौर तक: पाकिस्तान में कैसे मनाई जाती है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

जन्माष्टमी का महत्व

“पाकिस्तान में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2025” इस बार 16 अगस्त को पूरे भक्ति भाव और उत्साह के साथ मनाई जाएगी। हिंदू धर्म के इस पवित्र पर्व को हिंदू धर्म के प्रमुख और पवित्र त्योहारों में से एक श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि को हुआ था। भारत में यह त्योहार बेहद श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में भी जन्माष्टमी की धूम देखने को मिलती है?

इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 16 अगस्त 2025 को मनाई जाएगी, और पाकिस्तान में भी यह पर्व भारतीय परंपरा की तरह भक्ति भाव से आयोजित होगा।


पाकिस्तान में हिंदू समुदाय और जन्माष्टमी

पाकिस्तान में हिंदू समुदाय की आबादी कुल जनसंख्या का एक छोटा हिस्सा है, लेकिन सिंध प्रांत, खासकर अमरकोट, थारपारकर और मीरपुर खास जैसे इलाकों में उनकी संख्या काफी अधिक है। अमरकोट में तो करीब 52% आबादी हिंदू है, इसलिए यहां के त्योहारों में खास रौनक देखने को मिलती है।

पाकिस्तान के हिंदू परिवार, चाहे वे कराची, लाहौर, क्वेटा या हैदराबाद में रहते हों, जन्माष्टमी के दिन मंदिरों में एकत्रित होकर भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं। यह आयोजन अक्सर आधी रात तक चलता है, क्योंकि धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म रात्रि के समय हुआ था।


अमरकोट में जन्माष्टमी का जश्न

अमरकोट पाकिस्तान का वह इलाका है जो जन्माष्टमी के भव्य आयोजन के लिए मशहूर है। यहां के श्रीकृष्ण मंदिरों को रंग-बिरंगी लाइटों, फूलों की मालाओं और सजावटी वस्तुओं से सजाया जाता है। महिलाएं और पुरुष पारंपरिक पोशाक पहनते हैं, बच्चे श्रीकृष्ण और राधा के रूप में सजे-धजे नजर आते हैं।

मंदिरों में सुबह से ही भजन-कीर्तन शुरू हो जाते हैं और रात में विशेष आरती और झांकियां निकाली जाती हैं। यहां 56 भोग का प्रसाद भगवान को अर्पित करने की परंपरा भी है, जिसमें मिठाइयों और फलों की भरमार होती है।


कराची के मंदिरों में भक्ति की लहर

कराची पाकिस्तान का सबसे बड़ा शहर है और यहां स्वामीनारायण मंदिर तथा इस्कॉन मंदिर जन्माष्टमी के विशेष आयोजन के केंद्र माने जाते हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर यहां विशाल भंडारा, भजन संध्या और रास-लीला का आयोजन किया जाता है।

कराची में रहने वाले कई हिंदू परिवार अपने घरों में भी भगवान कृष्ण की मूर्ति को सजाते हैं और परिवार व पड़ोसियों के साथ मिलकर पूजा करते हैं। छोटे बच्चे माखन-चोर के रूप में तैयार होते हैं और मंदिरों में झूला सजाकर भगवान को उसमें विराजमान किया जाता है।


लाहौर और क्वेटा में उत्सव

लाहौर और क्वेटा में भी इस्कॉन मंदिर और अन्य कृष्ण मंदिर जन्माष्टमी पर विशेष रूप से सजाए जाते हैं। यहां रहने वाला हिंदू समुदाय संख्या में भले ही कम हो, लेकिन उत्सव का जोश किसी भी बड़े भारतीय शहर से कम नहीं होता।

लाहौर में जन्माष्टमी की रात को मंदिर में भजन-कीर्तन, शंखनाद और फूलों की वर्षा की जाती है। क्वेटा के मंदिरों में भी पारंपरिक तरीके से पूजा, भोग और मटकी-फोड़ जैसे आयोजन होते हैं।


इस्लामाबाद में मंदिर निर्माण और विवाद

इस्लामाबाद में श्रीकृष्ण मंदिर के निर्माण को लेकर लंबे समय से विवाद चलता रहा है। हालांकि, पाकिस्तान सरकार ने हिंदू समुदाय को मंदिर परिसर में चारदीवारी और श्मशान बनाने की अनुमति दी है।

जन्माष्टमी के दिन यहां भी भक्त व्रत रखते हैं, मूर्तियों को विशेष परिधानों से सजाते हैं और रात 12 बजे श्रीकृष्ण जन्म का उत्सव मनाते हैं। यहां की पूजा विधि में भी 56 भोग चढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है।


56 भोग और व्रत की परंपरा

पाकिस्तान के हर शहर में जन्माष्टमी के दिन 56 भोग अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है, ठीक वैसे ही जैसे भारत में। इसमें मिठाइयों, दूध, दही, मक्खन और फलों का विशेष महत्व होता है। भक्त दिनभर व्रत रखते हैं और आधी रात को भगवान के जन्म के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं।


सांस्कृतिक समानता, दूरी के बावजूद

हालांकि भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक और भौगोलिक दूरी है, लेकिन धार्मिक परंपराओं और भक्ति के मामले में हिंदू समुदाय की आस्था दोनों देशों में समान रूप से झलकती है। चाहे वह कराची का स्वामीनारायण मंदिर हो या अमरकोट का श्रीकृष्ण मंदिर — जन्माष्टमी के दिन इनकी सजावट, पूजा विधि और भक्ति गीत भारत की तरह ही होते हैं।


निष्कर्ष

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भारत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान के हिंदू समुदाय के लिए भी गहरी आस्था और भक्ति का पर्व है। कठिनाइयों और चुनौतियों के बावजूद, वहां के मंदिरों में भक्तजन उतनी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ यह पर्व मनाते हैं, जितना भारत में।

कराची, लाहौर, अमरकोट, क्वेटा और इस्लामाबाद के मंदिरों से उठने वाली भजन-कीर्तन की गूंज इस बात का प्रमाण है कि भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति की कोई सरहद नहीं होती।

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