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“तुम्हारी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?” – बाल विवाह से लड़कर नर्स बनी सोनाली की प्रेरणादायक कहानी

भारत में आज भी कई जगहों पर बाल विवाह की परंपरा गहरी जड़ें जमाए हुए है। समाज के दबाव, गरीबी और रूढ़िवादी सोच की वजह से कई बच्चियों को छोटी उम्र में ही अपना बचपन और सपने खोने पड़ते हैं। लेकिन कुछ लड़कियां ऐसी भी हैं, जो इन हालातों से लड़कर अपनी अलग पहचान बनाती हैं। महाराष्ट्र के बीड ज़िले की रहने वाली सोनाली बडे ऐसी ही एक बहादुर लड़की हैं, जिन्होंने 13 साल की उम्र में जबरन कराई गई शादी का विरोध किया और आज 26 साल की उम्र में अपने पैरों पर खड़ी होकर नर्स के तौर पर काम कर रही हैं।


बचपन से बोझ बनी शादी की बात

सोनाली का जन्म बीड ज़िले के शिरुर कासर गांव में एक गरीब परिवार में हुआ। माता-पिता खेतों में गन्ना काटने का काम करते थे और परिवार का पालन-पोषण बड़ी मुश्किल से होता था। तीन बहनें और एक भाई होने की वजह से आर्थिक तंगी हमेशा बनी रहती थी।

जब सोनाली नौवीं कक्षा में थीं, तभी उनकी शादी की बातें शुरू हो गईं। परिवार और रिश्तेदारों का कहना था कि “लड़कियों की जल्दी शादी कर देना ही सबसे अच्छा है।” उनकी बड़ी बहन की शादी भी बचपन में ही कर दी गई थी। समाज और परंपरा का दबाव इतना अधिक था कि सोनाली के माता-पिता मान बैठे कि यही सही रास्ता है।


“पहले मुझे पढ़ाई करने दो” – सोनाली की ज़िद

सोनाली पढ़ाई में अच्छी थीं और उनका सपना था कि कम से कम 12वीं तक पढ़ाई पूरी करें। जब भी कोई रिश्ता देखने आता, उन्हें स्कूल से जबरन घर बुला लिया जाता। लेकिन सोनाली हर बार यही कहतीं –
“मुझे पहले पढ़ने दो, मैं बाद में शादी कर लूंगी।”

लेकिन समाज और परिवार को उनका यह सपना समझ नहीं आया। उन्हें बार-बार यही सुनने को मिलता –
“तुम्हारी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?”


13 साल की उम्र में 30 साल के शख्स से शादी

आख़िरकार, नौवीं कक्षा में पढ़ते हुए ही उनकी शादी 30 साल के एक शख्स से तय कर दी गई। सिर्फ एक दिन पहले लड़के वाले देखने आए और दूसरे ही दिन शादी कर दी गई।

सोनाली के मुताबिक, “मेरे पिता ने धमकी दी थी कि अगर मैंने शादी से इनकार किया तो वे खुद को नुकसान पहुंचा लेंगे।”

हल्दी के कार्यक्रम के दौरान भी सोनाली खुश नहीं थीं। उनकी आंखों में आंसू थे। शादी गांव के ही स्कूल प्रांगण में बने मंदिर में हुई, और वहां पुलिस व सरपंच भी मौजूद थे।


विदाई से पहले लिया सबसे बड़ा फ़ैसला

शादी के बाद जब सोनाली को विदाई के लिए कार में बैठाया गया, तब उन्होंने ठान लिया कि वह ससुराल नहीं जाएंगी। रास्ते में उन्होंने उल्टी होने का बहाना बनाया, खिड़की खोली और फिर अचानक चलती गाड़ी से कूद गईं।

सोनाली बताती हैं –
“मुझे लगा कि अगर मैं इस कूद से बच गई तो ज़िंदगी में कुछ कर सकती हूं।”

वह बेहोश हो गईं, लेकिन सौभाग्य से गंभीर चोट नहीं आई। हालांकि इसके बाद उनका जीवन और कठिन हो गया। पूरे साल उन्हें रिश्तेदारों के घर-घर भेजा गया ताकि लोग बातें न करें।


पढ़ाई को बनाया हथियार

हालात कितने भी कठिन हों, सोनाली ने हार नहीं मानी। नौवीं की पढ़ाई छूट गई थी, लेकिन दोस्तों की मदद से उन्होंने परीक्षा दी और दसवीं का फॉर्म भरा।

पति बार-बार उन्हें अपने साथ ले जाने की कोशिश करते। कभी बहलाने की कोशिश करते तो कभी ज़बरदस्ती। लेकिन सोनाली पहाड़ों में छिप जातीं और तभी घर लौटतीं जब पति वापस चले जाते।

पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए सोनाली ने खेतों में मजदूरी शुरू कर दी। रोज़ाना 70 रुपये कमाकर वह किताबें और फॉर्म खरीदतीं।


आशा कार्यकर्ता और वकील से मिली राह

गांव की एक आशा कार्यकर्ता से मुलाकात के बाद सोनाली को सतारा की सामाजिक कार्यकर्ता और वकील वर्षा देशपांडे के बारे में पता चला। वर्षा देशपांडे बाल विवाह के खिलाफ आंदोलन चला रही थीं। सोनाली ने उनसे संपर्क किया और सतारा जाने का फैसला किया।

पैसों की कमी थी, तो सोनाली ने शादी का मंगलसूत्र छुपकर बेच दिया और 5000 रुपये इकट्ठा कर सतारा पहुंच गईं।


नर्सिंग की पढ़ाई और नया जीवन

सतारा में सोनाली ने प्राथमिक नर्सिंग कोर्स किया। इसके बाद पुणे जाकर अस्पतालों में काम करने लगीं। काम के साथ-साथ उन्होंने और पढ़ाई की।

जेएनएम नर्सिंग कोर्स में दाखिला लेना आसान नहीं था। फीस करीब 1 लाख रुपये थी, लेकिन सोनाली ने दिन-रात काम करके पैसे बचाए और कोर्स पूरा किया।

आज सोनाली पुणे के एक बड़े अस्पताल में नर्स के तौर पर काम कर रही हैं।


परिवार और बहनों के लिए उम्मीद

सोनाली की हिम्मत ने न सिर्फ उनकी ज़िंदगी बदली बल्कि उनकी छोटी बहन की किस्मत भी बदल दी। अब उनकी बहन भी 12वीं तक पढ़ाई कर पाई।

सोनाली कहती हैं –
“अगर मैं समझौता कर लेती, तो शायद मेरी बहनें भी पढ़ाई से वंचित रह जातीं। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं।”


समाज के लिए संदेश

26 साल की सोनाली अब अपने पैरों पर खड़ी हैं। वह बाल विवाह के खिलाफ बोलने से पीछे नहीं हटतीं। उनके अनुसार –
“लड़कियों को बोझ मत समझो। पढ़ाई ही उन्हें आगे बढ़ाने का सबसे बड़ा हथियार है।”

अब वह अपने जीवन में एक अच्छे साथी की तलाश कर रही हैं, लेकिन सबसे बड़ी खुशी यह है कि उन्होंने अपनी पहचान खुद बनाई है।


निष्कर्ष

सोनाली की कहानी सिर्फ एक लड़की की नहीं, बल्कि उन लाखों बच्चियों की आवाज़ है जिन्हें आज भी बचपन में ही शादी के बंधन में बांध दिया जाता है। गरीबी और समाज के दबाव के बावजूद सोनाली ने हिम्मत दिखाई और खुद को साबित किया।

उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि –
👉 मुश्किल हालात चाहे जैसे भी हों, हार नहीं माननी चाहिए।
👉 शिक्षा ही वह हथियार है, जो लड़कियों को सशक्त बना सकती है।
👉 समाज की पुरानी सोच को बदलना ज़रूरी है।

आज सोनाली जैसी बेटियां ही असली प्रेरणा हैं, जो यह साबित करती हैं कि “जिम्मेदारी से भागना नहीं, बल्कि उसे निभाने का हौसला ही इंसान को खास बनाता है।”

image source- BBC NEWS

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