देश

मुस्लिम महिलाओं के अधिकार और सुप्रीम कोर्ट के 5 ऐतिहासिक फैसले: एक विस्तृत विश्लेषण

भारत एक ऐसा देश है जहाँ विविध धर्म, परंपराएँ और सामाजिक व्यवस्थाएँ साथ-साथ चलती हैं। इनमें मुस्लिम समाज की पारिवारिक और व्यक्तिगत जिंदगी मुस्लिम पर्सनल लॉ से संचालित होती है। लेकिन कई बार यह सवाल उठता है कि क्या पर्सनल लॉ के तहत लिए गए फैसले महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों, समानता और गरिमा के साथ मेल खाते हैं?

पिछले कुछ दशकों में सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम फैसले सुनाए हैं, जिन्होंने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को नई दिशा दी है। कुछ फैसलों को समाज में प्रगतिशील बदलाव के रूप में देखा गया, तो कुछ फैसलों ने पर्सनल लॉ और संवैधानिक मूल्यों के बीच टकराव को और गहरा किया।

इस लेख में हम 5 ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का विस्तृत विश्लेषण करेंगे, जिनका सीधा असर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों, शादी, तलाक, भरण-पोषण और धार्मिक स्वतंत्रता पर पड़ा।


1. नाबालिग मुस्लिम लड़कियों की शादी पर फैसला (2025)

पृष्ठभूमि

19 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि 16 साल की मुस्लिम लड़की की शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध मानी जाएगी। यह फैसला जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस महादेवन की खंडपीठ ने सुनाया।

मामला कैसे शुरू हुआ?

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने आपत्ति जताई थी कि नाबालिग लड़की की शादी बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 और POCSO अधिनियम का उल्लंघन है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि NCPCR के पास इस आदेश को चुनौती देने का अधिकार नहीं है और मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत यह शादी वैध है।

कोर्ट का तर्क

  • मुस्लिम पर्सनल लॉ में शादी की उम्र का निर्धारण प्यूबर्टी (यौवनावस्था) से जुड़ा है।
  • यदि लड़की 16 साल की हो चुकी है और प्यूबर्टी तक पहुँच चुकी है, तो उसे विवाह योग्य माना जा सकता है।
  • यह फैसला बाल विवाह कानून बनाम पर्सनल लॉ की बहस को और तेज कर देता है।

सामाजिक प्रभाव

  • महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्यूबर्टी की उम्र में लड़की परिपक्व निर्णय नहीं ले पाती।
  • इससे बाल विवाह को अप्रत्यक्ष रूप से वैधता मिल सकती है।
  • दूसरी ओर, मुस्लिम समाज के नेताओं का कहना है कि सरकार या कोर्ट को धार्मिक पर्सनल लॉ में दखल नहीं देना चाहिए।

2. शायरा बानो बनाम भारत सरकार (2017) – तीन तलाक केस

पृष्ठभूमि

उत्तराखंड की शायरा बानो ने 15 साल शादीशुदा जिंदगी के बाद 2016 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनके पति ने चिट्ठी भेजकर तीन तलाक दे दिया था।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

2017 में पांच जजों की संविधान पीठ ने 3-2 के बहुमत से कहा कि तीन तलाक असंवैधानिक है।

  • यह महिलाओं की समानता और गरिमा का उल्लंघन करता है।
  • यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के खिलाफ है।

कानूनी असर

  • 2019 में संसद ने मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम पारित किया।
  • इसके तहत तीन तलाक गैरकानूनी और दंडनीय अपराध घोषित हुआ।

सामाजिक असर

  • महिलाओं में न्याय की उम्मीद जगी।
  • धार्मिक संगठनों ने इसे शरीयत में हस्तक्षेप करार दिया।
  • लेकिन महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस फैसले ने मुस्लिम महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की हिम्मत दी।

3. हाजी अली दरगाह केस (2016)

पृष्ठभूमि

मुंबई स्थित मशहूर हाजी अली दरगाह में 2011 के बाद से महिलाओं को अंदरूनी हिस्से (मजार तक) जाने से रोक दिया गया। दरगाह ट्रस्ट का कहना था कि यह धार्मिक नियमों के खिलाफ है।

कोर्ट का फैसला

2016 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने महिलाओं के पक्ष में फैसला सुनाया और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा।

  • ट्रस्ट धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देकर महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं कर सकता।
  • महिलाओं को भी पुरुषों की तरह दरगाह में प्रवेश का समान अधिकार है।

असर

  • यह फैसला महिलाओं की धार्मिक स्थलों में बराबरी की लड़ाई का प्रतीक बना।
  • इसके बाद सबरीमाला मंदिर और शनि शिंगणापुर मंदिर जैसे मामलों पर भी बहस तेज हुई।
  • मुस्लिम महिलाओं को धार्मिक स्थलों में समान अधिकार मिलने का रास्ता खुला।

4. शाह बानो केस (1985)

पृष्ठभूमि

इंदौर की शाह बानो ने 1978 में गुज़ारा भत्ते की मांग करते हुए केस दायर किया। उनके पति ने उन्हें तलाक देकर भत्ता देने से इनकार कर दिया।

कोर्ट का फैसला

1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया।

  • कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 सभी नागरिकों पर लागू होती है, चाहे उनका धर्म कोई भी हो।
  • मुस्लिम पति को तलाकशुदा पत्नी को भरण-पोषण देना होगा।

असर

  • इसे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की जीत माना गया।
  • लेकिन मुस्लिम समाज के एक बड़े वर्ग ने विरोध किया।
  • 1986 में राजीव गांधी सरकार ने दबाव में आकर मुस्लिम महिला (तलाक पर संरक्षण अधिनियम) पारित कर दिया, जिससे शाह बानो का फैसला पलट गया।

5. डेनियल लतीफ़ी केस (2001)

पृष्ठभूमि

शाह बानो केस के बाद बनाए गए 1986 के कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। वकील डेनियल लतीफ़ी ने याचिका दायर की।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

  • कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 वैध है।
  • लेकिन पति को सिर्फ इद्दत की अवधि तक ही नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी के लिए गुजारा भत्ते की व्यवस्था करनी होगी।
  • यानी इद्दत की अवधि के दौरान ही महिला की जीवनभर की आर्थिक सुरक्षा तय करनी होगी।

असर

  • इस फैसले ने मुस्लिम महिलाओं को लंबी अवधि के लिए आर्थिक सुरक्षा दिलाई।
  • शाह बानो केस से उत्पन्न विवाद को संतुलित रूप में सुलझाया गया।

इन फैसलों का समग्र असर

  1. कानूनी स्तर पर
    • सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया कि महिला के मूल अधिकार किसी भी धार्मिक प्रथा से ऊपर हैं।
    • लेकिन कई मामलों में पर्सनल लॉ और संवैधानिक कानून के बीच टकराव साफ नज़र आया।
  2. सामाजिक स्तर पर
    • मुस्लिम महिलाओं में जागरूकता और आत्मविश्वास बढ़ा।
    • अब वे कोर्ट का सहारा लेकर अपने अधिकारों के लिए लड़ सकती हैं।
    • हालांकि परंपरावादी तबका अब भी इन फैसलों को शरीयत में दखल मानता है।
  3. राजनीतिक स्तर पर
    • शाह बानो केस के बाद राजीव गांधी सरकार का फैसला और तीन तलाक पर मोदी सरकार का कानून इस बात का सबूत है कि मुस्लिम महिला अधिकारों का मुद्दा हमेशा राजनीतिक बहस में रहा है।

निष्कर्ष

मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई आसान नहीं रही है। शाह बानो केस से लेकर तीन तलाक और हालिया नाबालिग मुस्लिम लड़कियों की शादी पर फैसले तक, सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर महिलाओं के पक्ष में प्रगतिशील कदम उठाए।

हालांकि पर्सनल लॉ बनाम संवैधानिक अधिकारों की बहस अभी भी जारी है, लेकिन यह साफ है कि आने वाले समय में मुस्लिम महिलाओं को और अधिक न्याय और समानता दिलाने के लिए न्यायपालिका की भूमिका अहम रहेगी।

इन फैसलों ने यह संदेश दिया है कि चाहे कोई भी धर्म हो, महिलाओं की गरिमा, समानता और स्वतंत्रता सर्वोपरि है।

Image source – BBC NEWS

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *