Kushinagar

कुशीनगर अतिक्रमण हटाओ अभियान: उजड़े आशियाने, ग्रामीणों की आंखों में छलक आया दर्द

कुशीनगर/तुर्कपट्टी। कुशीनगर अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत महुअवा गांव में प्रशासन ने शुक्रवार को 44 अवैध मकानों को ढहाया, जिससे ग्रामीणों की आंखों में दर्द और निराशा झलक रही है।
कुशीनगर जिले के तुर्कपट्टी क्षेत्र के महुअवा गांव में शुक्रवार को प्रशासनिक सख्ती का ऐसा नज़ारा देखने को मिला जिसने सैकड़ों परिवारों की ज़िंदगी बदल दी। वर्षों से जिस ज़मीन पर लोग अपना घर-आशियाना बनाकर रह रहे थे, वही मकान हाईकोर्ट के आदेश पर प्रशासन के बुलडोज़र की जद में आ गए। लोगों की आंखों में वर्षों की मेहनत और सपनों के टूटने का दर्द साफ झलकता नज़र आया।


वर्षों से बसी बस्ती, पलभर में उजड़ी

ग्रामीणों का कहना है कि वे पिछले 40 से 45 वर्षों से इस ज़मीन पर अपने परिवार के साथ रह रहे थे। कई पीढ़ियों ने यहीं घर बनाए, यहीं बच्चों की परवरिश हुई और ज़िंदगी बसी। लेकिन जब शुक्रवार की सुबह प्रशासनिक टीम गांव पहुंची तो माहौल अफरा-तफरी में बदल गया। लोग अपने घरों से सामान निकालने लगे और बुलडोज़र की गड़गड़ाहट ने पूरे गांव में सन्नाटा फैला दिया।

जगदीश रावत और पारस जैसे परिवारों की दीवारें जब ढहाई गईं तो उनके चेहरे पर बेबसी और पीड़ा की रेखाएं साफ दिख रही थीं। इसी तरह छविया देवी, बिंदु देवी, गुड्डू यादव, सीताराम, कन्हाई, नथुनी और फुलवारी देवी के घर भी जमींदोज कर दिए गए। कई घरों की कटरैन और छप्पर को ढहते देख महिलाएं और बुजुर्ग आंसू पोंछते हुए दिखाई दिए।


हाईकोर्ट का आदेश बना कार्रवाई की वजह

दरअसल, महुअवा बुजुर्ग गांव के निवासी अहमद अंसारी ने चार साल पहले हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि गांव के लगभग 74 लोगों ने ग्रामसभा की सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जा कर मकान बना लिए हैं।

इस मामले की सुनवाई में हाईकोर्ट ने 22 अगस्त 2025 को स्पष्ट आदेश दिया कि जिला प्रशासन अवैध कब्जे को हटाकर 2 सितंबर तक रिपोर्ट अदालत में पेश करे। इसके बाद जिला प्रशासन हरकत में आया और 44 परिवारों के मकान अतिक्रमण की श्रेणी में आते ही तोड़ दिए गए।


प्रशासनिक अमला पहुंचा गांव

शुक्रवार की सुबह करीब 10 बजे से ही एसडीएम आकांक्षा मिश्रा और नायब तहसीलदार कुंदन वर्मा पुलिस बल के साथ गांव पहुंचे। देखते ही देखते कार्रवाई शुरू हो गई और बुलडोज़र मकानों पर चलने लगे।

इस दौरान कई ग्रामीणों ने दस्तावेज दिखाकर कहा कि उनका मामला जिलाधिकारी कोर्ट में लंबित है। मीरा देवी और संतोष तिवारी सहित 10 गृहस्वामियों ने लिखित सबूत भी पेश किए। लेकिन प्रशासन का कहना था कि हाईकोर्ट का आदेश सर्वोपरि है, इसलिए कार्रवाई नहीं रोकी जा सकती।


भूमिहीन परिवारों की दुहाई

गांव की राजकुमारी देवी, फुलवारी देवी और हरेंद्र सहित 20 से अधिक भूमिहीन परिवारों ने प्रशासन से गुहार लगाई कि उनके पास और कहीं जाने की जगह नहीं है। ऐसे परिवारों को प्रशासन ने जल्द से जल्द वैकल्पिक व्यवस्था करने का आश्वासन दिया, लेकिन फिलहाल उन्हें अतिक्रमित भूमि खाली करने का आदेश दिया गया।


भारी पुलिस बल तैनात

कार्रवाई को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम किए थे। तुर्कपट्टी मुख्य चौराहे से लेकर गांव के हर मोड़ पर पुलिस तैनात रही। क्षेत्राधिकारी डॉ. अजय कुमार सिंह के नेतृत्व में रामकोला, नेबुआ नौरंगिया, जटहां, कुबेरस्थान और तुर्कपट्टी थानों की पुलिस मौके पर मौजूद रही।

करीब पांच थानों का पुलिस बल तैनात किया गया ताकि किसी तरह की अप्रिय घटना न हो। प्रशासन की मौजूदगी में शांति व्यवस्था बनी रही, लेकिन ग्रामीणों के आंसू और टूटा विश्वास हर किसी के दिल को झकझोरता रहा।


उजड़े घर, टूटी उम्मीदें

जिन परिवारों ने अपनी ज़िंदगी की पूरी कमाई झोंककर आशियाना बनाया था, उनके लिए यह दिन किसी काले अध्याय से कम नहीं रहा। महिलाएं अपने घर टूटते देख चुपचाप रोती रहीं, बच्चे भयभीत नज़रों से देखते रहे और बुजुर्गों के चेहरे पर निराशा साफ झलक रही थी।

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन ने अचानक बुलडोज़र चला दिया, जबकि उन्हें उम्मीद थी कि शायद कोर्ट से उन्हें राहत मिल जाएगी। अब वे अपने भविष्य को लेकर असमंजस में हैं।


आगे की राह

जिला प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह से हाईकोर्ट के आदेश पर की गई है। जिन परिवारों का मकान गिराया गया है, वे वैकल्पिक व्यवस्था के लिए आवेदन कर सकते हैं। वहीं, कई ग्रामीणों का कहना है कि वे अपनी लड़ाई कोर्ट में जारी रखेंगे।

यह कार्रवाई कुशीनगर में लंबे समय से चल रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान का हिस्सा है। प्रशासन का रुख साफ है कि किसी भी कीमत पर ग्रामसभा की भूमि पर अवैध कब्जा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।


निष्कर्ष

कुशीनगर अतिक्रमण हटाओ अभियान ने महुअवा गांव के 44 परिवारों की ज़िंदगी को पूरी तरह बदल दिया है। वर्षों से जिस घर में वे रहते आ रहे थे, वही अब मलबे में बदल चुका है।

जहां एक ओर यह कदम सार्वजनिक भूमि को मुक्त कराने और कानून-व्यवस्था लागू करने के लिए ज़रूरी माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर पीड़ित परिवारों के लिए यह बेहद दर्दनाक और चुनौतीपूर्ण समय है।

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